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फैसला ज़िन्दगी का

फैसला ज़िन्दगी का

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      दूर क्षितिज पर सूर्य पहाड़ियों के आंचल में छिपने की तैयारी कर रह था. न जाने क्यों आज की शाम अजय को बोझिल-सी लग रही थी. वैसे तो उसे खुश होना चाहिए था क्योंकि छ्ह महीनों के बाद वह बँगलूरू से मुंबई अपने घर लौट रहा था. शीशे के भारी दरवाज़े, आधुनिक एयर कंडिशन ऑफीस  कंम्प्यूटर और टारगेट की तिलिस्मी दुनिया से दूर वह उस दुनिया में जा रहा था जो घर की पाठशाला कहलाती है, जहां वास्तविकता के कैनवास पर कलात्मकाता के रंगों को भरते हुए ज़िंदगी की खूबसूरत तस्वीर को उकेरना होता है.  

      अभी फ्लाईट का वक्त नहीं हुआ था. अपनी बिज़नेस क्लास सीट पर बैठे–बैठे वह ज़ीवन के गणित का हिसाब लगा रहा था. अचानक उसके मन के मुंडेर पर अमित नामक पखेरू आकर बैठ गया. 

      अमित और अमिता दोनो एक ही एम.एन.सी. (मल्टीनॅशनल कंपनी ) में काम करते थे. वे दोनो एक दूसरे के अच्छे मित्र थे और अपनी–अपनी दास्तानें शेयर किया करते थे. गुज़रते वक्त के साथ वे एक दूसरे के इतने करीब आ गए कि दोनो ने जीवन साथी बनने का निर्णय कर लिया. कुछ दिनों तक लिव इन ज़िंदगी बिताने के बाद वे शादी के बंधन में बंध गए. बड़े मजे से साथ–साथ रहने भी लगे. मगर कुछ ही दिनों बाद नौकरी के तनाव और सेल्स के टारगेट ने दोनो के रिश्तों में खटास पैदा कर दी. तेज़ रफ्तार की जीवन शैली और अधिक से अधिक पाने की मंशा ने दोनो के जीवन में ज़हर घोल दिया. इस अति और गति के कारण दोनो के बीच अविश्वास की धारा पनपने लगी. अमिता का प्रमोशन हो गया और अब वह धरती पर चलने की बजाय आसमान में उड़ने लगी थी. आज दिल्ली तो कल कोलकाता. लंच मुंबई में तो डिनर सिंगापूर में. आधुनिकता और पैसे के पीछे वह अंधी होती जा रही थी.

       दो साल पहले अमित जब पहली बार अमिता से मिला था तब वह उसकी सादगी और भोलेपन पर मर मिटा था. शायद ऐसा ही कुछ अमिता के साथ भी हुआ हो. मगर शादी के बाद दो वर्षों में ही अमिता का रंग-रूप बदल गया. उसने अपने आपको पूरी तरह से आधुनिकता के सांचे में ढाल लिया था. अब उसके पास अपनी शादीशुदा ज़िंदगी के लिए समय नहीं था. करियर का भूत सिर चढ़कर बोलने लगा था. शारिरिक मिलन तो दूर पर मन और संस्कृतियों का मिलन भी ठीक से नहीं हो पा रहा था. फिर क्या था! रोज किसी ना किसी बात को लेकर उनमें विवाद होने लगा. आखिर अपेक्षाएं, खुलापन और करियर की उड़ान के कारण शादी तलाक में बदल गई. प्यार का रिश्ता टूट गया और अजय ने अपने दो प्यारे मित्रों को खो दिया. इस घटना के बाद अमित ने तो मानो सन्नाटे को ही ओढ़-बिछा लिया था. जीवन उसका शून्य से घिर चुका था. कई दिनो तक वह डिप्रेशन का शिकार रहा. अजय को याद आ रहा था वह शेर– “ज़िंदगी को बदलने में वक्त नहीं लगता, पर वक्त बदलने में ज़िंदगी लग जाती है.”    

    अचानक किसी के आने की आहट हुई और अमित अपनी दुनिया में लौट आया. उसने देखा बगल में एक मॉडलनुमा लड़की खड़ी है जो अपनी सीट तलाश रही थी. शक्ल-सूरत से मैच्योर्ड लग रही थी पर थी बेहद खूबसूरत. किसी एअर हॉस्टेस से वह कम नहीं थी. आधुनिक लिबास और तंग कपड़ों में उसका आकर्षण और बढ़ गया था. दूध-सा गोरा बदन, लंबा कद, गठीली काया, गहरी काली नशीली आंखें, मदहोशी की अदा और डियोंड्रंड की खुशबू ने आते ही कई लोगों को एक नज़र उसकी ओर देखने के लिए मज़बूर कर दिया. एअर हॉस्टेस भी एक पल के लिए चकरा गई .......अरे मेरी साड़ी से भला इसकी साड़ी उजली कैसे.....सफेदी की ये चमकार !         

    टीवी एड़ की ये तस्वीर अजय को गुदगुदा ही रही थी कि तब तक बगल की रो से एक महोदय उठे, “मॅम आय थिंक योर सीट इज हियर” कहते हुए आनन-फानन में सहायता के लिए हाथ बढ़ा दिया.

   “सो नाईस ऑफ यू, थैंक्स फॉर योर कन्सर्न” एक लटके के साथ उस बाला ने जुमला फेंका और बिन मांगे मेहरबानी का कर्ज़ उतार दिया. अब वह अजय की ओर मुड़ी. 

  “ओ, हाय! आय एम नेक्स्ट टू यू, डू यू माईंड, इफ आय सीट एट विंडो साइट”

 “ ओ स्योर, व्हाय नॉट! इट्स माय प्लेजर” और अजय ने अपनी विंडोंवाली सीट उसे दे दी.  अजय का अगला वाक्य पूरा होने से पहले ही उस बाला ने खुद को सीट के हवाले कर दिया और बोली, “नाईस गाय, हाव आर यू?”

“आय एम फाईन, थैंक्यू, व्हाट अबाउट यू?”

“फाईन थैंक्स” इसके बाद दोनो ने चुप्पी साध ली.

     अजय ने राहत की सांस ली, ऊपरवाले के प्रति शुक्रिया अदा करते हुए मन ही मन.... ‘चलो सफर तो सुहाना रहेगा.’ उसने इयरफोन कान से लगाया और जगजीत सिंह द्वारा गाई गज़ल सुनने लगा- ‘तुम आए तो आया मुझे याद, गली में आज चांद निकला...’ उसकी निगाहें दोस्ताना चेहरे की तलाश में थी. मगर अगले ही पल अजय को यह समझते देर नहीं लगी कि वह लड़की सिर्फ़ आधुनिक ही नहीं अति आधुनिक भी है और शराब के नशे में धुत्त है. उसकी भीनी–भीनी मादक गंद और छुअन उसके भीतर तक उतरती चली जा रही थी. विस्की की महक उसे मदहोश करने लगी.  

    कुछ ही देर बाद हवाओं से अठखेलियां करता फ्लाईट आसमान से बातें करने लगा. अजय ने कनखियों से एक नज़र उस लड़की की ओर देखा. “अरे ये क्या! ये तो लुढ़क गई...एसी की ठंडी हवा और खिड़की का सहारा! यह बाला तो नींद के आग़ोश में चली गई..... सोचा था अच्छा टाईमपास होगा, कुछ बातें होगी, मगर ये क्या! सीधे टांय-टांय फिस्स्स! शटर क्लोज्ड!

    सुर बिखर चुके थे, मध्दिम–सी धुन में जंजीर फिल्म का वह गीत कानों में गूँजने लगा- ‘बना के क्यों बिगाड़ा रे, बिगाड़ा रे नसीबा.....ऊपरवाले ...हो ऊपरवाले .....! ’

   उसने कान से इयरफोन निकाला और ‘जय हो बाबा महर्षि धोंडू केशव कर्वे की, धन्य हो महात्मा फुले और सावित्री बाई फुले!’ ऐसा बुदबुदाते हुए वह अपनी आंखे मूँदने की कोशिश करने लगा.

    नारी स्वतंत्रता का प्रबल पक्षधर होते हुए भी वह मन ही मन उस लड़की की लाईफ स्टाइल से खिन्न हो रहा था. सोच रहा था कि नारी के विकास से ही समाज का विकास संभव है, मगर स्वतंत्रता का मतलब स्वच्छंदता और स्वैराचार तो नहीं होता! नारी मुक्ति, नारी सबलीकरण, नारियों को आर्थिक एवं सामाजिक समानता, सत्ता में भागीदारी, विशेष आरक्षण, जैसे तमाम मुद्दों को ठेंगा दिखाते हुए वह बाला बेखौफ-सी सो रही थी. जैसे उसने सब कुछ पा लिया हो.

    अजय सोच रहा था- नहीं–नहीं ये जो बगल में है वह सिर्फ़ छलावा मात्र है.....पानी का बुलबुला भर है.....वास्तव में संस्कृति की गंगा तो आज भी सुशील नारियों के कारण ही समाज में प्रवाहमान है. तभी तो ये दुनिया इतनी सुंदर है. अपवाद तो हर जगह होते हैं. दुनिया तो उसी को जगह देती है, जो यह जानता है कि उसे जाना कहां है. अजय अपना गंतव्य जानता था. उसने अपनी सोच को लगाम दिया और अब अपनी ज़िंदगी के बारे में सोचने लगा.

    नारी की दुनिया से बाहर निकलकर उसने अपने मन को नया मोड़ दिया. अपने घर की यादों में वह खो गया. घर जो अपना होता है. जहां धूप–छांव का सुकून होता है. फोन पर बाबूजी ने उसे बताया था कि उसके शादी की बात चल रही है और लड़की देखने का कार्यक्रम तय हुआ है. पर अजय था कि नर्वस हो रहा था. वह चाहता था कि पहले छोटी बहन की शादी हो जाती तो मम्मी–पापा  की एक बड़ी चिंता दूर हो जाती. मगर ऐसा हुआ नहीं, आखिर हर सोची हुई बात कहां पूरी होती है ! खैर अब रस्म तो निभाना ही था. उसकी आज़ाद ज़िंदगी में मौज मस्ती का कोटा शायद पूरा होने जा रहा था.   

     अचानक एक झटका-सा लगा और उस बाला का सिर अब अजय के कंधे पर टिक गया. उसकी लटें अजय के कंधे को चूमने लगी. वह कुछ अज़ीब–सा महसूस करने लगा. ज़ेहन में सपनों की बरसात होने लगी. उस लड़की का सिर उसे भार नहीं बल्कि सुकून दे रहा था. आखिर वह भी तो एक इंसान ही था, उसमें भी संवेदनाएं थी. पर हाय रे किस्मत! उफ़नती नदी के पास होते हुए भी हताश होकर वह खिड़की से बाहर आसमान ताकने के लिए मजबूर था. उत्तेजना और गर्माहट में थकी पलकें शीघ्र ही नींद की झील में तैरने लगी. नींद खुली तो मुंबई एरोड्रॅम उनका स्वागत कर रहा था.

   फ्लाईट लैंन्ड हुई और वह बगलवाली बाला अनगूंज–सी हवा में काफूर हो गई. सब कुछ इतना अचानक किसी जादू की तरह हुआ कि अजय को यकीन नहीं हो रहा था. कुछ देर तक कहीं वह सपने में तो नहीं जी रहा था! ऐसा उसे आभास होने लगा. हकीकत की वादियों में, इक्कीसवीं सदी के मुहाने पर खड़ा वह उस बाला को बस जाते हुए काफी देर तक निहारता रहा. सूखे पत्तों की तरह झर–झर झरते सुख को महसूस करते हुए वह रेत की तरह हाथों से सुकून भरे पलों को फिसलता देखता रहा. इसके आलावा आखिर कर भी क्या सकता था वह! मरुस्थल में अलमस्त पानी, पर मदहोशी का ये आलम! 

    खैर उसे ऐसे किसी सुख की उम्मीद नहीं थी मगर वह कोई साधू–संत भी तो नहीं था. शीतल हवा का एक प्यारा–सा झोंका आया, दिल को सुकुन मिला और फिर उसे यह सोचने पर मज़बूर कर दिया कि ऐसे बेमौसम हवा का क्या भरोसा! अपनी मर्जी से बहती है, कभी पुरवा तो कभी पछुआ. अब उदासी अनचाही घटा–सी घिर आई और उसके पूरे बदन में समा गई. जेहन में किसी चिंतक की आवाज धीरे से दस्तक दे गई- यह सदी महिलाओं की सदी है. ज़िंदगी अपने तरीके से जीने का उन्हें भी पूरा हक है.         

     अजय के आने की खबर से घरवाले काफी प्रसन्न थे. यह इस बात का प्रतीक भी था कि वह घरवालों के फैसले से सहमत है. सारे जरूरी कामकाज निपटाकर अजय शाम को अपने माता-पिता और बहन डिंपल के साथ बोरीवली जाने के लिए तैयार हो गया. तैयार भी क्यों ना होता, आखिर लड़की देखने का कार्यक्रम जो बना था! देखा जाए तो आज का दिन उसके लिए बड़ा खास था, इसीलिए तो उसे बँगलूरू से बुलाया भी गया था. ऑफीस से छुट्टी लेना उसके लिए नाको चने चबाने जैसा था! पर क्या करे पापा का बुलावा ही इतना आग्रह भरा था कि चाहते हुए भी वह टाल न सका. वह जानता था कि बॉस से छुट्टी माँगने का मतलब है उसकी खरी–खोटी सुनना. उसका यह अंदाज सही निकला. बडे़  ना-नुकुर के बाद आखिर पांच दिन की छुट्टी मंजूर हुई थी, जिसमें उसे ज़िंदगी का फैसला करना था. तन- मन, और आत्मा के मिलन का टारगेट तय करना था.

      खैर लड़की देखने का कार्यक्रम निश्चित समय पर संपन्न हो गया. रिश्ता जाति-बिरादरी से था, जो आजकल बड़ा मुश्किल होता जा रहा है! इस रिश्ते से घर के लोग बेहद खुश थे. अजय के मम्मी-पापा को लड़की बहुत पसंद थी. उसकी बहन डिंपल भी इस रिश्ते से बेहद खुश थी. अजय के पिता राजेश्वर मेहरा सरकारी बैंक से असिस्टंट जनरल मैनेजर के पद से पिछले साल ही रिटायर्ड हुए थे और वे लड़कीवालों को अच्छी तरह से जानते थे. वे सोच रहे थे कि अजय की शादी हो जाए तो लगे हाथों बेटी के भी हाथ इसी साल पीले कर देंगे. लड़की के पिता हरदयाल नारंग जी रेल के वरिष्ठ रिटायर्ड अधिकारी थे तो माँ रिटायर्ड शिक्षिका दोनों को अच्छी खासी पेंशन मिल रही थी. ज़ायज़ाद भी अच्छी बनाई थी उन लोगों ने. अपनी इकलौती बेटी ‘ज़ोया’ को बड़े लाड़-प्यार से उन लोगो ने पाला था. कॉनवेंट मे पढ़ी, लंबी, गोरी, छरहरी, स्मार्ट नौकरी पेशा इंजीनियर ज़ोया की तनख्वाह भी अच्छी थी. बिज़नेस टूर के सिलसिले में देश-विदेश में आना जाना उसके लिए आम बात थी.

    ज़ोया कुछ मॉडर्न ज़रूर है पर शादी के सांचे में पड़ने के बाद पारिवारीक जिम्मेदारियों में ढ़ल जाएगी, ऐसा मेहरा जी का मानना था. अजय भी तो आखिर उड़ता पंछी है. अत: मेहरा जी चाहते थे कि जल्दी से दोनों की शादी हो जाए और वे घर-गृहस्थी में लीन हो जाएं. हाय प्रोफाइल बहू के आ जाने से समाज में उनका रूतबा और बढ़ जाएगा. दोनो परिवारों के बीच स्नेह संबंध भी बढ़ जायेगा. बच्चों के जीवन में नया रंग भरने का सपना दोनों परिवार के लोग देखने लगे .  

     “उमा रिश्ता तो बहुत अच्छा है, बेटा इंजीनियर, बहू भी इंजीनियर. लो अब साक्षात लक्ष्मी घर आ रही है. अपने सारे अधूरे सपने पूरे कर लेना, जिसके लिए तुम जीवन भर मुझे और मेरी नौकरी को कोसती रही. अब तुम्हारी तंगी खत्म हो जायेगी. मगर उमा, सच कहूं! बच्चों की परवरिश के लिए जीवन में तुमने जो त्याग किया है ना, यह सब उसी का फल है. अंतरंगताएं हमसे छिटककर अंधेरे की सुनसान सुरंगों में भले दुबकी रहीं, पर तुमने अपनी आस्था और विश्वास की फुहार से जीवन की बगिया को सदा हरा-भरा बनाए रखा. पैंतीस साल बैंक की नौकरी में पंद्रहों बार मेरा ट्रांसफर कई गांव और शहर में हुआ, मगर तुमने नौकरी करते हुए बच्चों की सारी जिम्मेदारियों को न सिर्फ़ संभाला बल्कि उन्हें काबिल भी बनाया. जीवनभर करोड़ों के आँकड़ों से मैं खेलता रहा पर सरकारी नौकरी में इतनी मोटी तनख्वाह के बारे में कभी मैं सोच भी नहीं पाया. प्रगत टेक्नोलॉजी के ज़माने की यह पीढ़ी कितनी आगे है ना! खूब कमाते हैं और खूब मज़े भी करते हैं. कितना परिवर्तन आ गया है ज़माने में, है ना! जो भी हो, हमें तो यह स्वीकार करना ही होगा कि आजकल के बच्चे स्मार्ट हैं. वे अवसरों का लाभ उठाना खूब जानते हैं. अपना भला-बुरा समझते हैं.”  मेहरा जी ने अपने मन की बात पत्नी उमा से कहा.

     “ अजी आप भी ना! क्यों पुरानी बीमारी को कुरेदे जा रहे हो! अब मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है. वह वक्त कुछ और था. जीवन की गुनगुनी धूप–छांव से ही मन के सारे विषाद हम दूर कर लिया करते थे. तब मनोरंजन और ऐशो-आराम के इतने साधन नहीं थे. बच्चों की जिम्मेदारियों को संभालते-संभालते आत्मा पर लगी फफुँदियाँ कब दूर हो गई पता ही नहीं चला. मगर हां, तब रिश्तों की नींव पक्की हुआ करती थी. प्रकृति की मनोहारी वादियों में हम अपना तनाव दूर कर लिया करते थे. आस-पास की हरियाली को देखते-देखते हम खुद हरे-भरे हो जाते थे. आज परिवार और संबंधो की बजाय लोग धन को अधिक तूल देने लगे हैं. महिलाएं अब पहले से अधिक चालाक होने लगी हैं. भगवान से मेरी प्रार्थना है कि अपनी होनेवाली बहू हमारी उम्मीदों पर खरी उतरे.” अजय की मां कुछ गंभीर होते हुए बोली और अपने कमरे में चली गई.               

      बहरहाल मिलने-जुलने और सपनों की उधेड़बुन में दो दिन बीत गए. नारंग जी का फोन भी आ गया कि उन्हें और ज़ोया को अजय पसंद है, ‘आप लोगों का क्या फैसला है ?’ पर मेहरा जी की इस विषय पर अभी अजय से खुलकर बात नहीं हुई थी, अत: उन्होंने एक दिन का समय माँगा और फोन रख दिया. आखिर मौका देखकर उस दिन मेहरा परिवार ने अजय से इस बात का ज़िक्र छेड़ ही दिया.

     अजय के लिए यह इम्तिहान की घड़ी थी. उसने सबसे पहले अपने घरवालों की राय जाननी चाही. सबने एक सुर में हामी भर दी - “ज़ोया हम सबको पसंद है”. अजय की माँ तो लड्डू का बॉक्स लेकर ही बैठी थी, उसे सिर्फ बेटे के हाँ का इंतजार था. आज तक वह घरवालों की हर उम्मीद पर खरा उतरा था. उसने देखा उसकी बहन आँखों में सतरंगी सपने संजोए बैठी है. पिताजी नाक पर का चश्मा ऊपर नीचे करते, अपनी छड़ी को सहलाते हुए “हाँ”  सुनने के लिए आतुर हुए जा रहे हैं. सबको उस प्यारी-सी खबर का इंतजार था, जो उनके लिए एक औपचारिकता मात्र थी.

     “आप सभी की भावनाओं का मैं सम्मान करता हूँ. ज़ोया वास्तव में सुंदर, करीयर ओरियंटेड स्मार्ट इंजीनियर है. आधुनिक और मॉडर्न खयालों की भी है.” अजय के मुख से इतना सुनते ही उसकी मां ने लड्डू बाँटना शुरू कर दिया.

     अजय ने बात को आगे बढ़ाते  हुए  कहा, “एकाँत में ज़ोया से मेरी जो बातें हुई उससे मैं संतुष्ट हूँ, उसकी बातें मेरे लिए सुखद रही. उसकी सोच की मैं कद्र करता हूँ. मैं खुद एक मल्टीनेशनल कंपनी में बतौर ‘आई.टी.’ इंजीनियर 12 से 16 घंटे की ड्यूटी करता हूँ, प्रोफेशनल हूँ. मेरे साथ ज़ोया जैसी कई लड़कियाँ सहकर्मी के रूप में काम करती हैं, अत: मैं उनकी मानसिक सोच और भावनाओं से पूरी तरह वाकिब हूँ. मोटी तनख्वाह, टारगेट, प्रमोशन, सेल्स और काम के घंटो के तनाव में हम लोगो का जीवन सिर्फ एक यंत्र बनकर रह जाता है. घर-परिवार और देश- दुनिया से हम पूरी तरह कट जाते हैं. देश दुनिया में क्या हो रहा है इससे हम लोगों को कोई वास्ता नहीं रह जाता. हमेंशा काम का तनाव और सामने बॉस का चेहरा! पापा, आप जानते हैं! हम कमाते हैं राजा की तरह पर खटते हैं गदों की तरह और खाते हैं भिखारियों की तरह. ये भी कोई ज़िंदगी है पापा! क्या करेंगे इतने पैसों का, जब सुकून का खाना और सुकून की नींद ही नशीब ना हो!”   

    एक पल के लिए अजय शांत हो गया. मोटी तनख्वाहवाली नौकरी किस तरह व्यक्तिगत जीवन से लोगों को अलहदा कर देती है, इस बात पर वह खेद व्यक्त कर रहा था. सबके चेहरों पर एक सन्नाटा पसर गया था. ना जाने वह आगे क्या कहने जा रहा है. एक लंबी सांस भरते हुए अजय ने फिर बोलना शुरू किया,

 “पापा, मैं खूब पैसे कमानेवाली, करीयर ओरियंटेड, प्रोफेशनल इंजीनियर नहीं, बल्कि आप लोगों के लिए एक गृहलक्ष्मी जैसी बहू चाहता हूँ, जिसके पास इतना समय और संस्कार हो कि वो हम सबके बारे में सोच सके, हमें अपना समझकर हममें रच-बस सके. उसका दुख हमारा और हमारा सुख उसका हो सके. आपके पोता- पोती, आयाओं या नाना-नानी के रहमोंकरम पर नहीं, बल्कि माता-पिता और दादा-दादी की छ्त्र - छाया में पले बढ़े. घर की रसोई गमके, बगिया फले-फूले. नए साज़ का झँकार हो.”

    अजय की आँखों में अमित और अमिता का वह मासूम-सा चेहरा तैर गया, जब उन्हें नई-नई नौकरी मिली थी और परिंदो ने उड़ान भरना शुरू किया था. पंखों मे बल आते ही वे अपनी ज़मीन को भूल गए. आसमान को बांहों में समेटने की कोशिश में ज़िंदगी के अहम फैसले को दरकिनार कर दिया परिंदों ने! आज के ज़माने में शायद यह बात हो पर!   

    “भैया कहां खो गए आप! ये हमारे प्रश्न का जवाब नहीं है, जरा खुलकर बोलो.” डिंपल की इस आवाज ने अजय की तंद्रा भंग की. वह आगे बोला, “ज़ोया के पास इतना वक्त ही कहाँ है पापा? हमें होने में विश्वास करना चाहिए दिखने में नहीं. हम दोनो की सोच दो ध्रुवों के समान हैं, अलग-अलग मौसमों के स्वभाव से संचालित. उसे विदेश का आकर्षण अधिक है. देश-विदेश में मैं भी घूमता हूँ, पर मैं अपनी मिट्टी का तिलक करता हूँ, अपने वतन से प्यार करता हूँ. मुझे अपनी संस्कृति पर गर्व है. भारतीय होने का अभिमान है. पापा, मैं उसके योग्य नहीं हूँ! नहीं हूँ मैं उसके योग्य! ज़ोया अपनी जगह पर सही है. वह अपने विचारों से समझौता करने को भी तैयार है पर मैं उसके सपनों को मरने नहीं देना चाहता. आय एम सॉरी पापा, मैं अपनी ज़मीन से कटना नहीं चाहता! साथ ही ज़ोया को सपनों को लगाम भी नहीं लगाना चाहता. फ्लाईट का वक्त हो रहा है, कुछ देर में मुझे निकलना होगा.” यह कहते हुए अजय ने अपनी मम्मी-पापा के चरण छूए और बहन को प्यार दिया. सबकी आँखें नम हो गई.

    फ्लाईट का ज़िक्र होते ही अजय की आँखों के सामने उस मॉडेलनुमा बाला का चेहरा तैर गया......वह तो महज़ एक टाईमपास थी .......मगर यहां तो ज़िंदगी का फैसला करना था.   

 


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