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Charumati Ramdas

Children Stories Action Thriller


4  

Charumati Ramdas

Children Stories Action Thriller


मुझे सिंगापुर के बारे में बताइये

मुझे सिंगापुर के बारे में बताइये

10 mins 275 10 mins 275

मैं और पापा इतवार को अपने रिश्तेदारों से मिलने गए. वो लोग मॉस्को के पास ही एक छोटे से शहर में रहते थे, और हम इलेक्ट्रिक ट्रेन से जल्दी वहाँ पहुँच गए.

अंकल अलेक्सेइ मिखाइलोविच और आण्टी मीला ने प्लेटफॉर्म पर हमारा स्वागत किया.

अलेक्सेइ मिखाइलोविच ने कहा:

 "ओहो, डेनिस्का कितना बड़ा हो गया है!"

और मीला आण्टी बोली:

 "डेनिस्का, आ जा, मेरे साथ चल." और उसने पूछा: "ये बास्केट कैसी है?"

 "इसमें प्लास्टिसीन (रंग-बिरंगी मिट्टी का गूदा) है, पेन्सिलें हैं और पिस्तौलें भी हैं..."

 मीला आण्टी मुस्कुराने लगी, और हम रेल की पटरियाँ पार करके स्टेशन की बगल से निकलकर एक कच्चे रास्ते पर आए: रास्ते के किनारों पर पेड़ थे. मैंने जल्दी से जूते उतार दिए और नंगे पैर चलने लगा, कुछ गुदगुदा रहा था, एडियों में कुछ चुभ रहा था, वैसे ही जैसे पिछले साल हुआ था, जब मैं सर्दियों के बाद पहली बार नंगे पैर चला था. अब रास्ता किनारे की ओर मुड़ गया, और हवा में नदी की और कोई मीठी-मीठी ख़ुशबू फ़ैल गई, मैं घास पर दौड़ने लगा, उछलने लगा और चिल्लाने लगा: "ओ-हा-हा-आ!" मीला आण्टी ने कहा:

 "बछड़े जैसी ख़ुशी!"

जब हम घर पहुँचे तो लगभग अंधेरा हो चुका था, और हम सब छत पर चाय पीने बैठे, मुझे भी बड़े कप में चाय दी गई.

अचानक अलेक्सेइ मिखाइलोविच ने पापा से कहा;

 "पता है, आज रात को 00.40 मिनट पर हमारे यहाँ चैरितोशा आने वाला है. वो हमारे यहाँ एक दिन रहेगा, कल रात को ही जाएगा. वो इस तरफ़ से गुज़र रहा है."

पापा तो बेहद ख़ुश हो गए.

 "डेनिस्का," पापा ने कहा, "मेरा 'कज़िन' – मतलब तेरा बड़ा चाचा चैरिटोन वासिल्येविच आ रहा है! वो कब से तुझसे मिलना चाहता था!"

मैंने कहा:

 "मैं उसे क्यों नहीं जानता?"

मीला आण्टी फिर से हँसने लगी.

 "क्योंकि वो 'नॉर्थ' में रहता है," उसने कहा, "और मॉस्को बहुत कम आता है."

मैंने पूछा:

 "और वो करता क्या है?"

अलेक्सेइ मिखाइलोविच ने ऊँगली ऊपर उठाई:

 " वो - लम्बी समुद्री यात्राओं का कप्तान है."

मेरी पीठ पर जैसे चींटियाँ रेंगने लगीं. ऐसा कैसे? मेरे बड़े अंकल – समुद्री कप्तान हैं? मुझे इस बारे में बस अभी पता चला? पापा हमेशा ऐसे ही हैं – सबसे ज़रूरी बात भी उन्हें 'बाइ-चान्स' ही याद आती है!

 "क्या है, पापा! तुमने मुझे बताया क्यों नहीं कि मेरे अंकल लम्बी समुद्री यात्राओं के कप्तान हैं? जाओ, अब मैं भी तुम्हारे जूते साफ़ नहीं करूँगा!"

मीला आण्टी फिर से खिलखिलाने लगी. मैंने कब से नोट किया है कि मीला आण्टी बात-बेबात हँसने लगती है. इस समय वो बिना किसी बात के हँस रही थी. मगर पापा बोले:

 "मैंने तुझे पिछले से पिछले साल ही बताया था, जब वो सिंगापुर से आया था, मगर तब तू बहुत छोटा था. और तू, शायद, भूल गया. मगर कोई बात नहीं, अब सो जा, कल तू उससे मिलने ही वाला है!"

अब मीला आण्टी ने मेरा हाथ पकड़ा और छत से घर के भीतर ले गई, हम एक छोटे कमरे से गुज़रते हुए दूसरे छोटे कमरे में आए. वहाँ कोने में एक छोटा सा दीवान रखा था. खिड़की के पास एक बड़ा फूलदार पार्टीशन रखा था.

 "ये यहाँ, सो जा," मीला आण्टी ने कहा. "कपड़े बदल ले! तेरी ये पिस्तौलों वाली बास्केट मैं पैरों के पास रखती हूँ."

मैंने पूछा:

 "और पापा कहाँ सोएँगे?"

उसने कहा:

 "शायद, छत पे ही सोएँगे. तुझे तो मालूम है कि तेरे पापा को ताज़ी हवा कितनी पसन्द है. क्या हुआ? क्यों पूछ रहा है? क्या तुझे डर लगेगा?"

मैंने कहा:

 "बिल्कुल नहीं."

मैं कपड़े बदल कर लेट गया.

मीला आण्टी ने कहा:

 "आराम से सोना, हम यहीं, पास में ही हैं."

और वो चली गई.

मैं दीवान पे लेट गया और बड़ी चौख़ाने वाली चादर ओढ़ ली. लेटे-लेटे मैं सुन रहा था कि छत पर हल्की आवाज़ में बातें कर रहे हैं और हँस रहे हैं, और मैं सोना चाहता था, मगर पूरे समय अपने कप्तान बड़े चाचा के बारे में सोचता रहा.

मैं ताज्जुब से सोच रहा था, कि कैसी होगी उसकी दाढ़ी? क्या दाढ़ी सीधे गर्दन से निकल रही होगी, जैसा कि मैंने तस्वीरों में देखा था? और पाईप कैसा होगा? सीधा या मुड़ा हुआ? और तलवार – डिज़ाइन वाली या प्लेन? लम्बी समुद्री यात्राओं के कप्तानों को बहादुरी दिखाने के लिए डिज़ाइन वाली तलवार से सम्मानित किया जाता है. सही है, क्योंकि अपनी यात्राओं के दौरान वे लगभग हर रोज़ आइसबर्ग्स से टकराते हैं, या येS बड़ी-बड़ी व्हेलों और सफ़ेद भालुओं का सामना करते हैं, या मुसीबत में फँसे जहाज़ों को बचाते हैं. साफ़ है, कि ऐसी परिस्थिति में बहादुरी दिखाना ही पड़ती है, वर्ना तो तुम ख़ुद ही अपने सभी नाविकों के साथ डूब जाओगे, और जहाज़ भी बर्बाद कर दोगे. और अगर ऐसा जहाज़, जैसे न्यूक्लियर उपकरणों से लैस बर्फ तोड़ने वाला जहाज़ 'लेनिन' – नष्ट हो जाए, तो दुख तो होगा ही, है ना? और, वैसे भी, ज़रूरी नहीं है कि लम्बी यात्राओं वाले कप्तान सिर्फ 'नॉर्थ' की तरफ़ ही जाएँ, ऐसे भी होते हैं जो अफ्रीका जाते हैं, और उनके जहाज़ों पर बन्दर और मुंगूस रखे जाते हैं, जो साँपों को मार डालते हैं, उनके बारे में मैंने किताब में पढ़ा था. ये ही मेरा वाला लम्बी यात्रा का कप्तान – पिछले से पिछले साल सिंगापुर से आया था. कितना वण्डरफुल नाम है: "सिं-गा-पुर"!... मैं अंकल से ज़रूर कहूँगा कि मुझे सिंगापुर के बारे में बताए: वहाँ कैसे लोग रहते हैं, कैसे बच्चे हैं, कैसी नौकाएँ और कैसे उनके पाल हैं...ज़रूर पूछूँग़ा. और मैं इत्ती देर तक सोचता रहा, और न जाने कब मेरी आँख़ लग गई...

मगर बीच रात में ही मैं भयानक गुरगुराहट से जाग गया. शायद ये कोई कुत्ता था, जो कमरे में घुस आया था, उसने सूंघ लिया कि मैं यहाँ सो रहा हूँ, और उसे ये अच्छा नहीं लगा. वो बड़े खूँख़ार तरीके से गुर्रा रहा था, कहीं फूलदार पार्टीशन के नीचे से, और मुझे ऐसा लगा, कि मैं अंधेरे में उसकी झुर्रियों वाली नाक और सफ़ेद नुकीले दाँत भी देख रहा हूँ. मैं पापा को आवाज़ देना चाहता था, मगर मुझे याद आया कि वो दूर सो रहे हैं, छत पे, और मैंने सोचा कि आज तक तो मैं कभी भी कुत्तों से नहीं डरा था और इस समय भी घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है. वैसे भी मैं जल्दी ही आठ साल का होने वाला हूँ.

मैं चिल्लाया:

 "तूबा! सो जा!"

कुत्ता फ़ौरन चुप हो गया.

मैं खुली आँखों से अँधेरे में लेटा था. खिड़की से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, सिर्फ एक टहनी नज़र आ रही थी. वो ऊँट जैसी थी, जैसे वो पिछले पैरों पर खड़ा होकर कुछ कर रहा हो. और मैं सात की टेबल (पहाड़ा) दुहराने लगा, इससे मुझे फ़ौरन नींद आ जाती है. और सही में : मैं सात सत्ते तक भी नहीं पहुँचा, कि मेरे दिमाग़ में सब गड्ड-मड्ड होने लगा, और मैं लगभग सो ही गया, मगर तभी कोने में, पार्टीशन के पीछे कुत्ता, जो कि शायद नहीं सोया था, फिर से गुर्राने लगा. और वो भी कैसे! पहले से सौ गुना ज़्यादा डरावनी आवाज़ में. मेरे भीतर कुछ-कुछ चुभने लगा. मगर फिर भी मैं उसके ऊपर चिल्लाया:

 "तूबा! लेटा रह! फ़ौरन सो जा!..."

वो फिर से थोड़ा सा शांत हो गया. तभी मुझे याद आया कि मेरी ट्रेवल-बास्केट मेरे पैरों के पास रखी है और उसमें मेरी अपनी चीज़ों के अलावा खाने का एक पैकेट भी है, जो मम्मा ने रास्ते के लिए रख दिया था. मैंने सोचा कि अगर इस कुत्ते को थोड़ा सा खिला दूँ, तो उसका मूड अच्छा हो जाएगा और वो मुझ पर गुर्राना बन्द कर देगा. मैं उठकर बैठ गया, बास्केट में हाथ डालकर टटोलने लगा, और हालाँकि अंधेरे में समझना मुश्किल था, फिर भी मैंने उसमें से कटलेट और दो अंडे निकाले – मुझे उनके बारे में कोई अफ़सोस नहीं था, क्योंकि वो सॉफ्ट-बॉइल्ड थे. जैसे ही कुत्ता फिर गुर्राया, मैंने एक के बाद एक दोनों अंडे पार्टीशन के पीछे फेंक दिए:

 "तूबा! खा ले! और फ़ौरन सो जा!..."

पहले तो वो चुप रहा, मगर फिर इतने गुस्से से गुर्राया, कि मैं समझ गया: उसे भी सॉफ्ट-बॉइल्ड अंडे पसन्द नहीं हैं. तब मैंने उसकी तरफ़ कटलेट फेंका, सुनाई दे रहा था कि कैसे कटलेट उससे टकराया, कुत्ता चुप हो गया और उसने गुर्राना बन्द कर दिया.

मैंने कहा:

 "अब ठीक है. और अब – सो जा! फ़ौरन!"

कुत्ता और नहीं गुर्राया, बल्कि सिर्फ नाक सूँ-सूँ करता रहा. मैंने अपने आपको कम्बल में कसके बन्द कर लिया और सो गया...

सुबह सूरज की तेज़ धूप से मैं उछलकर उठा और सिर्फ अंडरवियर में छत पे भागा. पापा अलेक्सेइ मिखायलोविच और मीला आण्टी मेज़ पे बैठे थे. मेज़ पे सफ़ेद मेज़पोश था और पूरी प्लेट भरके लाल-मूली रखी थी, और ये बहुत ही ख़ूबसूरत लग रहा था, और सब लोग नहाए-धोए, साफ़-सुथरे लग रहे थे कि मेरा दिल ख़ुश हो गया, और मैं भी आंगन में नहाने के लिए भागा. सिंक घर के दूसरी तरफ़ लगा था, जहाँ सूरज की रोशनी नहीं आ रही थी, और ठण्डक थी, पेड़ की छाल नम थी, और नल से बर्फ़ जैसा ठण्डा पानी आ रहा था, वो नीले रंग का था, मैं बड़ी देर तक पानी से छपछपाता रहा, और ठण्ड से जम गया, और मैं ब्रेकफ़ास्ट के लिए भागा. मैं मेज़ पर बैठा और कुर-कुर करके मूली खाने लगा, काली ब्रेड की स्लाईस में रखकर, उस पर नमक डाला, मुझे बहुत अच्छा लग रहा था – मैं पूरे दिन उसी तरह कुरकुराती मूली खाता रहता. मगर फिर अचानक मुझे सबसे महत्वपूर्ण बात याद आई!

 मैंने कहा:

 "और, लम्बी यात्राओं वला कप्तान कहाँ है? कहीं आपने मुझे बुद्धू तो नहीं बनाया!"

मीला आण्टी खिलखिलाने लगी, और अलेक्सेइ मिखायलोविच ने कहा:

 "ऐह, तू भी! सारी रात तो उसीकी बगल में सोता रहा और तुझे पता भी नहीं चला....अच्छा, चल, ठीक है, मैं अभी उसे लाता हूँ, वर्ना वो पूरा दिन सोता रहेगा. यात्रा से थक कर आया है."

मगर तभी छत पर लाल चेहरे और हरी-हरी आँखों वाला एक लम्बा आदमी आया. वो नाइट सूट में था. उसकी कोई दाढ़ी-वाढ़ी नहीं थी. वह मेज़ के पास आया और भयानक मोटी आवाज़ में बोला:

 "गुड मॉर्निंग! और ये कौन है? कहीं डेनिस तो नहीं?"

उसकी आवाज़ इतनी भारी थी, कि मुझे ताज्जुब होने लगा कि वह उसके गले में समाती कैसे है.

पापा ने कहा:

 "हाँ, ये सौ ग्राम झाईयाँ – यही है डेनिस. मिलिए. डॆनिस, ये है तुम्हारा कप्तान जिसका तुम बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे!"

मैं फ़ौरन खड़ा हो गया. कप्तान ने कहा:

 "वॉव!"

और उसने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ा दिया. वो इतना कड़ा था, जैसे बोर्ड हो.

कप्तान बहुत प्यारा था. मगर उसकी आवाज़ बहुत डरावनी थी. और फिर, तलवार कहाँ है? कोई पैजामा पहना है. और, पाईप कहाँ है? सीधा या मुड़ा हुआ – चाहे जैसा भी हो, मगर कोई पाईप तो हो! मगर नहीं था...

 "नींद कैसी आई, चैरितोशा?" मीला आण्टी ने पूछा.

 "बहुत बुरी!" कप्तान ने कहा. "पता नहीं, क्या बात थी. पूरी रात कोई मुझ पर चिल्ला रहा था. समझ रहे हैं, जैसे ही मेरी आँख लगती, कोई चिल्लाता:

 "सो जा! फ़ौरन सो जा!" यही सुनकर मेरी नींद खुल जाती! फिर थकावट अपना असर दिखा रही थी, पूरे पाँच दिनों से सफ़र कर रहा था, आँखें चिपकी जा रही थीं, मैं फिर से ऊँघने लगता, सो जाता, और, सपने में, समझ रहे हैं, फिर से वही चीख़: "सो जा! लेट जा!" ऊपर से, न जाने कहाँ से मुझ पर तरह-तरह की चीज़ें गिरने लगीं – अण्डे, या कुछ और....शायद, सपने में मुझे कटलेट्स की ख़ुशबू भी आई थी. और नींद में कुछ अजीब-अजीब से शब्द भी सुनाई दे रहे थे : या तो 'कूश,' या 'अपोर्त'...

 "तूबा," मैंने कहा. "अपोर्त" नहीं, बल्कि "तूबा". क्योंकि मैंने सोचा कि वहाँ कोई कुत्ता है...कोई उसी तरह से गुर्रा रहा था!"

 "मैं गुर्रा नहीं रहा था, मैं, शायद, खर्राटे ले रहा था?"

 ये तो बहुत भयानक था. मैं समझ गया कि वो मुझसे कभी भी दोस्ती नहीं करेगा. मैं उठकर अटेन्शन की पोज़ में खड़ा हो गया. मैंने कहा:

 "कॉम्रेड, कैप्टन! बिल्कुल गुर्राहट जैसा था. और मैं, शायद कुछ डर गया था."

कप्तान ने कहा:

 "आराम से. बैठ जा."

मैं मेज़ पे बैठा था, और महसूस कर रहा था, कि मेरी आँखों में किसीने रेत डाल दी है, वो चुभ रही है, और मैं कप्तान की तरफ़ देख नहीं पा रहा हूँ. हम सब बड़ी देर तक चुप रहे.

फिर उसने कहा:

 "ध्यान रख, मैं ज़रा भी गुस्सा नहीं हूँ."

मगर फिर भी मैं उसकी तरफ़ नहीं देख सका.

तब उसने कहा;

"अपनी डिज़ाइन वाली तलवार की कसम."

उसने ये इतनी प्रसन्नता से कहा, कि मेरे सीने से जैसे फ़ौरन बोझ हट गया.

मैं कप्तान के पास गया और बोला;

 "अंकल, मुझे सिंगापुर के बारे में बताइए।


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