इश्क और पहलवानी

इश्क और पहलवानी

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नाना -नानी ,मामा -मामी का रिश्ता ऐसा होता है, जब तक माँ जीवित रहती तब तक बेहद जुड़ा होता है लाड प्यार ऐसा मिलता जैसे स्वर्ग मिल गयाहप। यानि हर सुविधा बरक़रार रहती है। कहने का तात्पर्य ये है की नाना -नानी ,मामा -मामी का पक्ष सबसे ज्यादा भारी होता है। मैने अपनी पढाई वहाँ रहकर पूरी की इस बिच में मुझे पहलवानी का शौक लग गया था। पहले के ज़माने में जिम वगैरे तो थे नहीं, वर्जिस के लिए देशी अखाड़े थे। मामा के गाय का दूध भरपूर था। जब पहली बार अखाड़े गया. अखाडा उज्जैन में मक्सी रोड पर था। बहुत ही बड़ा था। जगह -जगह रस्से लटक रहे ,कुश्ती लड़ने के लिए लाल मिटटी का अखाडा। दंड- बैठक के लिए आइना लगी व्यवस्था ,मलखम्ब आदि के साथ एक छोटा सा हनुमान मंदिर भी अंदर बना हुआ था , अखाड़े के नियम होते है। जो पहलवान पहले से वर्जिस कर रहा हो उससे परमिशन लेना पड़ती थी। यानि कहना पड़ता था- हुकुम पहलवान ,पहलवान बोलता था -बाबा का आशीर्वाद। ये सब मुझे मालूम नहीं था। जैसे ही में अखाड़े में पहले पहुँच गया | एक बड़ा पहलवान वर्जिस करने के पहले। पहले से आये पहलवान से अनुमति मांगी। बोला -हुकुम पहलवान | मैने भी बोल दिया हुकुम पहलवान। फिर वो बोले -हुकुम पहलवान। मैने फिर बोल दिया- हुकुम पहलवान | जबकि मुझे बोलना था -बाबा का आशीर्वाद। पहलवान ने कहा -नए आये हो पहलवान। मैने कहा -हाँ , पहलवान में आज ही नया आया हूँ। मै डेढ़ पसली का पहलवान और वहां के एक से बढ़कर एक भुजंग पहलवान। लेकिन कायदा भले ही वर्जिस के लिए आया डेढ़ पसली का मनुष्य को वो पहलवान ही कहते थे। मुझे पहली बार किसी ने पहलवान बोला -मुझे रात भर ख़ुशी के मारे नींद ही नहीं आयी|.पहले दिन ही कुछ ज्यादा वर्जिस कर ली थी , दूसरे दिन चले उठे ही नहीं जा पा रहा था | जब बाजार में हिम्मत कर के गया तो हाथ- पाव की स्टाइल बदल चुकी थी यानि अदा पहलवानो सी। बड़ी मुश्किल से ठीक होने में दो चार दिन लग गए ,जब अखाड़े गया तो पहलवानों ने हिदायत दी की पहलवान लंगोट लगा के आया करो ये चड्डी नहीं चलेगी,सरसो के तेल की शरीर पर मालिश करों। वर्जिस के बाद एकदम पानी नहीं पीना बल्कि केले और दूध पियो। बहुत सी हिदायत लिए घर पर आया। नाना-नानी, मामा -मामी के यहाँ कोई कमी नहीं थी. उस समय अमिताभ की हेयर स्टाइल ज्यादा चलन में थी और बेल बॉटम की चौड़ाई में होड़ चलती थी | जिसकी ज्यादा और उसमे कली लगी | वो ज्यादा आकर्षित। मुझे इन्ही के कारण एक लड़की से प्यार हो गया , और वो मुझे चाहने लगी | किन्तु अखाडा जाइन करने के बाद हेयर स्टाइल पहलवानी करने के पालन में सारी हीरो गर्दी रफूचक्कर हो गई। जब दूसरे दिन लड़की ने मुझे देखा तो पहचान ने इंकार कर दिया। मेने इशारे से कहा मै वो ही हूँ जिसे तुमप्यार करती हो। कागज पर हाथ से लिखे प्रेम पत्र का चलन उस समय जोरों पर था. बस इसी कारण बिच में ही पहलवानी छोड़ दी , रोमांटिक हीरो का जमाना था ज़माने के साथ चलना था। उसके प्यार के खातिर फिर से स्टाइल बना ली| बडो ने समझाया किंतु इश्क का भूत सर चढ़ा हो तो उस समय समझाइश कोन सुनता है| पढाई का अपना लक्ष्य पूरा कर तुरंत नौकरी दूर लग जाने से. सब बिछड़ गए , उस समय मोबाईल आदि तो थे ही नहीं , टेलीफोन तो चलन में थे मगर हमारे और उसके पास नहीं थे। नौकरी लग जाने से शादी के ऑफर माता -पिता के पास आने लगे , उनकी पसद ही सब कुछ तय करती थी | उन्होंने मेरी शादी कर दी | उधर लड़की ने सोचा मुझे भूल गए होंगे, उसने भी शादी कर ली। किन्तु बुढ्ढे हो गये मगर उसकी छवि दिल में आज भी बनी हुई है| किन्तु मालूम नहीं कहाँ पर होगी। अब मेरे बच्चो की शादी होने वाली है। और फिर से इश्क फरमाना भी क्या अच्छा लगता है| टीवी ,रेडियों पर दर्द भरे गाने देख ,सुनकर मन को तस्सली कर लेते है और यही सोचते है की या तो पुरे पहलवान बन जाना था या या पूरा राँझा , ये अधूरा पन ठीक वैसा ही होता है जैसे बिना पतवार की नाव। मै पुराने ख्यालों में रमा था की पीछे से पत्नी की आवाज आई -जाओ नहा के सब्जी भाजी ले आओ और आटा भी पिसा लाना। तब ऐसा लगा की ये छाती पर मूंग दलने कहा आगई। बाजार में मूंग की दाल का भाव पूछा तो पांव के निचे की जमीं खिसक गई. तब से इश्क का भूत उतरा और आटे दाल के भाव याद आगये। इश्क मौसम की बहार की खुश्बू की तरह आया और उम्र को भेदता हुआ | एक महकाती कसीश हुकुम पहलवान की याद दिलाकर चला गया।


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