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कितना...

कितना बेगैरत है ये ज़माना नहीं चाहता कभी सुनना फ़साना, जख्मी दिल लेकर लिखा स्याही से कल रात, पर अब नहीं है इच्छा, इसे जमाने को सुनना।

By Rakshita Haripushpa
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