तुम
तुम
यह जो तुम हो ना
इस मासूम चेहरे की परत के नीचे
यह जो तुम हो ना
जिसने मन में खूबसूरती उतार रक्खी है
जिसके मन से, एक से एक ख़ूबसूरत भाव छलकते है
जिसके मन से बहती है प्यार की जादुई खुशबू वाली नदी
जो मुझे अपने संग बहा ले जाती है
यह जो तुम हो ना
जिसने अपने आप को किसी झूठ का मुखौटा नहीं पहनाया
जिसकी आँखों से निकलकर मेरी कविताएं फिज़ा बन जाती है,
जिसके होंठों से बहकर लफ्ज़ सुर बन जाते है,
जिसकी उंगलियों के लम्स से में महकने लग जाता हूँ
जिसके कदमों को है रक्स की लगन
जिसके चेहरे पर है एक अलग ही फितूर
जिसके दिल में बहती है शांत सी नदी
ओर भी बहुत कुछ
यह जो तुम हो ना
जिसे इस जमाने में जिस्म की परत से आगे कोई देखेगा ही नहीं
मैंने तुम्हें देखा है तुम्हारे दिल की गहराई तक
मैंने तुम्हें देखा है उस जिस्म की परत के आगे तुम्हारे अंदर झाँककर
मैंने तुम्हें देखा है दुनिया की हर हद से बढ़कर
मैंने तुम्हें देखा है खुद से भी बढ़कर
तुम दरअसल चांद से निकलती लालिमा हो
तुम नदी का बहाव हो।
तुम राग हो
तुम आग हो
यह जो तुम हो ना
यह होना महज़ होना नहीं है
तुम्हारा जिस्म जिस्म है
कोई खिलौना नहीं है
तुम आईना हो
जिसमें में देखता हूँ ख़ुद को
चूमता भी हूँ ख़ुद को
मैं,
चाहता हूं,
तुम अपनी आँखों के सुरमे से,
तुम्हारे मन पे काला टीका लगा लो,
तुम्हारे हसीन मन को मेरी नज़र ना लगे।
और में ताउम्र तुम्हें यूँ ही देखता रहूँ
तुम्हें यूँ ही सोचता रहूँ..
