सपने
सपने
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महलों से बड़े हुआ करते थे घर वो मिट्टी के,
जब देखे थे हमने भी ‘सपने सुहाने लड़कपन के’।
उम्र भले कम थी लेकिन दिल परिंदो सा उड़ता था
ख़्वाहिशों कि भरमार थी लेकिन हाथ अपना तंगा था।
सपना था कल्पना चावला सी उड़ान होगी एक दिन
इरादे मज़बूत और दिल छोटा बच्चा था।।
भविष्य से अंजान हम,बुने हज़ारों सपने थे
लड़खडाये कदम मगर मज़बूती से हर बार संभले थे।
यारों के साथ चाँद तारों को तो बातों में ही ले आते थे।
ख़ुशियों का वो पिटारा जीवन की अंधड़बुन में कहीं खो गया।
अब याद बहुत आते है वो दिन सपने सुहाने लड़कपन के।
