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JAYANTA TOPADAR

Others

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JAYANTA TOPADAR

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रक्त का रंग तो वही लाल ही है...

रक्त का रंग तो वही लाल ही है...

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रक्त का रंग तो 

वही 'लाल' ही है, मगर 

आज वस्तुवाद के पीछे गतिमान

अत्याधुनिक समाज में 

तथाकथित 'उन्नत' लोगों की 

भीड़ में अनायास ही 

अमीरी-गरीबी का 

लंबा 'फासला' 

नज़र आ ही जाता है!

 

अक्सर हमें अखबारों 

एवं दूसरी खबरों के माध्यम से 

यह सुनने को मिलता है 

कि जब कोई विख्यात/सुप्रसिद्ध, 

आर्थिक रूप से सबल व्यक्ति 

किसी अस्पताल के बिस्तर पर 

पड़ा होता है, तो 

उस व्यक्ति के लिए 

मददगारों की लंबी कतार 

खड़ी हो जाती है। 


मसलन, अगर उस 'अमीर' व्यक्ति को 

रक्त की कमी महसूस हो, 

तो सरकारी-बेसरकारी (सेवा) संगठनों की, 

दोस्तों एवं चाहनेवालों की

भीड़ लग जाती है। 

बस फोन करते ही 

सबकुछ हाथोंहाथ हो जाता है। 


मगर जब एक अख्यात-अनुन्नत,

आर्थिक रूप से कमज़ोर इंसान 

अस्पताल के बिस्तर में 

किसी खास 'ग्रुप' की (मुश्किल से मिलनेवाली) 

'रक्ताभाव/रक्ताल्पता' की वजह से कराहता नज़र आता है/कराहती नज़र आती है, 

तब "रक्तदान--महान सेवा" कहने वाले लोग, 

'मीटिंग' इत्यादि में भाषण देनेवाले, तस्वीरों में सहर्ष नज़र आनेवाले लोग 'असल' ज़िन्दगी में 

एक ज़रूरतमंद, असक्षम-असहाय-गरीब को 

मदद और सहारे का हाथ 

बढ़ाने को क्यों आगे 'नहीं' आ पाते?? 


वो लोग भीड़ में कहाँ 'गुम' हो जाते हैं?? उनसे दूरभाषयंत्र या किसी और माध्यम से 

खबर पहुंचाने के बाद भी क्यों

 'तथाकथित' सेवा (?) भाव की 

कोई गुंजाइश नहीं होती...?? 


क्या ये 'फर्क' 

अमीरी-गरीबी का है? 

क्या ये फर्क 'आर्थिक स्थिति मजबूत या कमज़ोर' होने की वजह से बनता है? 


क्यों किसी गरीब-असहाय परिवार की इस द्वार से उस द्वार तक 

दौड़-भाग कर

आखिर माथा पिटकर 

बैठ जाने की 

नौबत आ जाती है?


अक्सर ऐसी विषम परिस्थितियों में ही लोभी-स्वार्थी-अमानव 'दलाल' 

आगे आता है और 

'एक-एक' बोतल रक्त 

ऊँची क़ीमतों में बेचा करता है 

और मजबूरन 

उस बीमार व्यक्ति के परिवारवाले 

ऊँची क़ीमत पर 'बाहरी स्रोतों से 

(दलालों के माध्यम से)' रक्त खरीदकर 

अपने स्वजन को ज़िंदा रखने की 

बेशक़ कोशिश करते हैं। 


ज़ाहिर है 'डूबते को 

तिनके का सहारा' ही 

बहुत होता है। 


अब सवाल ये उठता है 

कि आखिर "रक्तदान--महान सेवा"-- 

ये उक्ति 

किसी असहाय-गरीब इंसान की 

ज़रूरतों के हिसाब से 

कहाँ तक 

कारगर सिद्ध होती है??? 

ये रक्त की दलाली 

कब खत्म होगी???


कब इस दुनिया में इंसानियत 

सही मायनों में जाग्रत होगी? 

कब रक्तदान 

अमीरी-गरीबी की 

संकीर्णता से 

परे उठकर 

पुनः एक 

महान सेवा की 

गरिमा को 

प्रतिष्ठित कर पाएगी???


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