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Dr. Akansha Rupa chachra

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Dr. Akansha Rupa chachra

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पीहर

पीहर

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माँ तेरा प्यार बहुत याद आता है।

तुमसे मिलने को मन तड़पता है।

तेरे आँचल को एक पल नहीं छोड़ती थी।

तेरी गोद में लेट कर खुली आँखों से सपने

बुनती थी।

जब मैं जिद करके नाराज होती थी।

पापा का मेरे सिर को सहलाना याद आता है।

कच्ची पक्की रोटियों को अमृत समझ के

खाना, मेरी नादानियों को चुटकी बजाकर

माँ तेरे गुस्से से बचाना, दीदी की फटकार,

भाई का बेशुमार प्यार, माँ मुझे मायका बहुत याद आता है।

मनपसंद खाना, मस्ती में रहना, अल्हड़ सा बचपन

बहुत याद आता है।

माँ एक राज तुझे बताना है

तेरी बेटी को अब ससुराल में हर हाल मे मुस्कुराना है

बिन खाये भी ,बिन सोये भी, हर दुख को सहना सीख गई।

लाख कोशिश करके भी, कुछ ताने पीड़ा सह कर ही

न दिल के जख्म दिखाना है।

तेरी बेटी को आँसू पी मुस्कुराना है।

रेशमी अहसासों से पली बड़ी, नाजो नखरों वाली थी

जिम्मेदारी निभाने में अब तेरी बेटी दर्पण निहारना भूल गई,

माँ मुझे क्यों अपने से दूर किया।

हालातों ने मजबूर किया।

तुझे मिलने को तड़पती हूँ।

दिल का हाल कैसे बयान करूँ।

ये कैसे बंधन समाज के

तेरी झलक पाने को, सौ सौ यत्न करके भी

सारे फर्ज निभा कर भी, फटकारी जाऊँ मैं,

आँसुओं के सैलाब को अपने मन में दबाऊँ

कितने भी यत्न करके भी मैं, पापा की शहजादी 

आपकी की रानी बेटी

ससुराल में रानी बहू न बन पाऊँ

मैं ,


काश ! कुछ ऐसा हो जाता।

हाथ पकड़ कर जो अपने साथ अर्धांगिनी बना

कर लाता है।

माँ बाप के बिछड़ने का दुख वो समझ पाता।

माँ बेटी की जान होती है।

बेटी के रूप देने वाले सृजनहार, सृष्टि के मालिक

बेटी के रूप को देना है।

तो कोमल हृदय न दे दिल काँच की तरह तोड़ने

वालों को अहसास नहीं होता।

पूरी रात माँ बाप की याद में तड़पने वाली आँखें

सुबह सब की देखभाल करती है।

हजार अच्छाई न देख पाया कोई

एक गलती की सजा सौ बार सुनाई जाती है।

माँ हर बार तुझे आँसू पोंछ कर कहती हूँ।

ससुराल में तेरी बेटी पलकों पर बैठाई जाती है।

अब तो मैंने उदासी में भी मुस्कुराना सीख लिया।

पीहर मेरा छूट गया।

दिल में कसक उठती है।

मर्यादा की बेटियों में मेरा पीहर मुझ से दूर हुआ।

माँ मुझे पीहर  याद आता है।


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