STORYMIRROR

Rahul Dev

Others

3  

Rahul Dev

Others

ओस की वह बूँद

ओस की वह बूँद

1 min
14K


जाड़े का मौसम

सुबह की ठंडी हवाऐं

और अचानक दृष्टि पड़ी उस पर

वह ओस की बूँद !

कितने छोटे से क्षेत्र में सिमटी

बैठी घास पर

ताकती शून्य से अनंत की ओर

मानो लाज के घूँघट में सिमटना चाहती हो;

छिपाना चाहती हो

अपना वृत्तीय स्वरुप

घनेरी रात के बाद की सुबह में

हलकी धूप के स्पर्श से

हर्षातिरेक में झूमना चाहती हो,

बजना चाहती हो वह

घुँघरूवओं की तरह

बूँद !

पूर्ण है स्वयं मैं

समेट सकती है

विश्व को स्वयं में

स्त्रोत है नवशक्ति का

वह ओस की बूँद

प्रतीक है जीवन का

गति का !

 

 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन