मरम्मत
मरम्मत
1 min
359
वो झांकते हैं दरारों से
कुछ उम्मीद लिए
रूखे होठों की सलवटें हैं
उधड़ी सी बिना सीए,
ताक रहे हैं अंजान राहों को
के कर जाए कोई मखमली मरम्मत
भरे इन दरारों को एकसार
चांदी से चमकते लेप से,
बनाएं एक झीना सा झरोखा फ़िर
कि दीदार मयस्सर हो मुझे..
दिखाई दे वही गुलाबी हीर।
