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Asha Porwal Gupta

Others

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Asha Porwal Gupta

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मन

मन

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अथाह दर्द के समंदर में डूबा हुआ है मन

बेपरवाह अपने पन का मारा हुआ है मन।

क्यूँ ठोकरें खाकर बार बार वही जाकर ठहर जाता है मन

कोमल है, नादां है, भोला है मन सबकुछ पीछे छोड़ आगे

बढने की सोच को साकार नहीं कर पाता है मन।

उलझा रहता है अपनों के बीच अपनत्व की खोज में

शायद अपनापन मिल जाए, कहीं किसी ओर से

इस झंझावात में उलझा हुआ हमेशा रहता है मन।

कोई समझ जाएं बिन कहे दर्द की दास्ताँ

यही आस हर घड़ी लगाता है मन

खोया, खोया बस! खोया सा रहता है मन।



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