महफ़िल
महफ़िल
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हम तो तेरी महफिल में
यूँ ही चले आये थे
तुझसे मिलने की मगर
अदब से चाह तो थी
हम क्या थे कैसे थे
मुझे तो नहीं था पता
शायद तुम्हें थी खबर
हम खुशनसीबों में थे
जिन्हें तुम्हारी मिली नज़र
ना अपना कोई करिश्मा था
ना अपना कोई जतन
ना जाने क्यों तूने मुफ्त में दे दी
मुझे अपना प्रेम रतन
बाद में जाना तू ऐसा ही है
हाँ तू ऐसा ही है
मुफ़्त में बाँटता है
तू यह रूहानियत
तेरी मौज का तो तू ही जाने
तेरे इसी मौन से
भरती रहती है झोली सबकी
कौन ना सदके जाये
तेरी इस दरियादिली पर
हम भी शामिल हुये जाते हैं
इन महफिल में
कोई हैरानी की बात तो नहीं......
