मेरी माँ
मेरी माँ
1 min
272
जिनका पल्लू पकड़ के चलना सीखा
जिनकी उंगलियाँ पकड़ के रस्ता ढूंढा
जिन्होने ऐसे वक़्त मे बिना सोचे
अपने से पहले मुझे सब दिया
जब कभी मैं कठिनाइयों मे पड़ा
उन्होंने बिना बताए सब कुछ ठीक किया
बहुत सपने होने के बावजूद भी
जिन्होने बस मेरे सपनों से उन्हें पूरा करना चाहा
उन्होंने मुझे इतना कुछ दिया
और सबसे अमूल्य कि उन्होंने मुझ पे विश्वास किया
माँ मेरे लब्ज़ों मे इतनी ताकत और वो सक्षमता नहीं
कि तेरे अवतार को दूसरों के सामने अच्छे से रख सकूँ।
माँग लूँ यह मन्नत कि फिर यही "जहाँ " मिले
फिर वही गोद और फिर वही "माँ " मिले।
