कविता
कविता
1 min
295
अक्सर देखा करती हूँ मैं
अनेक कवितायें कल्पनाओं में
जो इंतज़ार में है मेरे शब्दों के
उतरने को मेरी कलम से
और मैं
व्यग्र हो उठती साकार देने को
उन शब्दों को जो आँखों मे निरंतर
उछालता कूदता सा यथार्थ होने को बेसबरा सा..
हाँ , मैं स्वीकारती हूँ मेरी कविता
क्षणिक होती है पर सराबोर होती हैं
मायाजाल से मैं कवियत्री नहीं
जादूगरनी हूँ
शब्दों की, अहसासों की, भावनाओं की..
