#खुद की बात
#खुद की बात
1 min
334
साथ भी सभी के मैं पराई सी रहती हूँ
अपने में बसती, मैं अपने में रहती हूँ
मुस्काती कभी ओझल सा चित्र बिखेरती
सबसे अलग, खुद एक सफ़र में रहती हूँ
स्वयं को टटोलकर, मैं स्वयं में जीती
आज भी खुला वो आसमान रखती हूँ
बिखरे पँखों को जोड़ना सीखा है मैंने,
अक्सर ही ऊँची एक उड़ान मैं रखती हूँ
बदलतें विचार बेशक देखे होंगे तुमने,
विचारों का काल्पनिक जहान रखती हूँ
मोड़ पर किस्सा, कहानी सब अलग बनी
मैं गुजरते हर पथ के निशान रखती हूँ
साथ भी सभी के मैं पराई सी रहती हूँ
अपने में बसती, मैं अपने में ही रहती हूँ
