STORYMIRROR

असअद भोपाली

Others

2  

असअद भोपाली

Others

जब ज़िंदगी सुकून से महरूम हो

जब ज़िंदगी सुकून से महरूम हो

1 min
304


जब ज़िंदगी सुकून से महरूम हो गई

उन की निगाह और भी मासूम हो गई


हालात ने किसी से जुदा कर दिया मुझे

अब ज़िंदगी से ज़िंदगी महरूम हो गई


क़ल्ब ओ ज़मीर बे-हिस ओ बे-जान हो गए

दुनिया ख़ुलूस ओ दर्द से महरूम हो गई


उन की नज़र के कोई इशारे न पा सका

मेरे जुनूँ की चारों तरफ़ धूम हो गई


कुछ इस तरह से वक़्त ने लीं करवटें 'असद'

हँसती हुई निगाह भी मग़मूम हो गई


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन