जब ज़िंदगी सुकून से महरूम हो
जब ज़िंदगी सुकून से महरूम हो
1 min
302
जब ज़िंदगी सुकून से महरूम हो गई
उन की निगाह और भी मासूम हो गई
हालात ने किसी से जुदा कर दिया मुझे
अब ज़िंदगी से ज़िंदगी महरूम हो गई
क़ल्ब ओ ज़मीर बे-हिस ओ बे-जान हो गए
दुनिया ख़ुलूस ओ दर्द से महरूम हो गई
उन की नज़र के कोई इशारे न पा सका
मेरे जुनूँ की चारों तरफ़ धूम हो गई
कुछ इस तरह से वक़्त ने लीं करवटें 'असद'
हँसती हुई निगाह भी मग़मूम हो गई
