ग़ज़ल
ग़ज़ल
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बादल बिना ही बरसे गरज कर निकल गए
अपना जिन्हें समझा के वो दुश्मन निकल गए।
पाला था जिन्हें बाहों के झूले में झुला कर
वो आस्तीँ के साँप थे डस कर निकल गए।
सूरत पे हमने कर के भरोसा गुनाह किया,
इन काठ के पुतलों के दिल पत्थर निकल गए।
शमा जलाये बैठे थे हम जिनके नाम की।
शोला थे उनकी आँच में अरमाँ पिघल गए।।
थपकाते रहे पीठ को जो हाथ आज तक
उन्हीं के हाथों पीठ में खंजर थे चल गए।
महफ़ूज जिनको हाथ के छालों सा था रखा।
करुणा वो अपने हाथों से छाले मसल गए।
