ग़ज़ल
ग़ज़ल
1 min
244
बादल बिना ही बरसे गरज कर निकल गए
अपना जिन्हें समझा के वो दुश्मन निकल गए।
पाला था जिन्हें बाहों के झूले में झुला कर
वो आस्तीँ के साँप थे डस कर निकल गए।
सूरत पे हमने कर के भरोसा गुनाह किया,
इन काठ के पुतलों के दिल पत्थर निकल गए।
शमा जलाये बैठे थे हम जिनके नाम की।
शोला थे उनकी आँच में अरमाँ पिघल गए।।
थपकाते रहे पीठ को जो हाथ आज तक
उन्हीं के हाथों पीठ में खंजर थे चल गए।
महफ़ूज जिनको हाथ के छालों सा था रखा।
करुणा वो अपने हाथों से छाले मसल गए।
