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बेड़ियाँ

बेड़ियाँ

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है दिल में आस कुछ पाने को,

तकती राह है जाने को,

कितने अरमान है दिल में,

मगर बेड़ियाँ सी है रोकने को


तेज़ धार नैन ऐसे,

जैसे तकता कोई निशान हो

समंदर सी ललकार है उसमे,

परन्तु गागर तक ही जाने को


अधरों से झड़ती रसवानी जैसे,

सरस्वती का ध्यान हो

कितने अंगारे धरे है उसने,

पर एक चिंगारी तक ही

सीमित हो


मिट्टी से वो लिपटी ऐसी,

जैसे खिलता कमल हो

कितने लोग जुटे हुए है,

मासूम फूल तोड़ने को..


है ताकत इतनी उसमे,

की मंज़िल भी आए पाँव छूने को

एक मर्द को देती जनम है वो,

पर उसकी मर्दानगी चूल्हे को..


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