बारीश की तरह
बारीश की तरह
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ये टप टप सारी रात होती रही यूं
कमबख्त तन्हा इश्क की तरह
ये ज़ुल्म के मुजरा में मगरुर रही यूं
घुंघरुओं के छन छन की तरह
आलम कभी नहीं बताया यूं रोने का
बारिश की बू आने की तरह
पर वो वफाई का ताबीज यूं दिखाती
हो जैसे लैला हीर की तरह
यूं तो हमसाया भी बड़ा अजीब था
मगर मैं अनजान की तरह
तभी तो लौट आया देख करतब को
उस फकीर रांझे की तरह
भुलने से नहीं भूलें थे हम उनको यूं
कीमती ज़ख्मों की तरह
खत आते रहे लौट आने के बाद यूं
अज़ीज़ हुक़ूमत की तरह
