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अधूरी ख़्वाहिश

अधूरी ख़्वाहिश

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होती कहाँ है,हर मुराद पूरी,
नहीं तो पूरी कर देते हर ख्वाहिश
हर चाहत तुम्हारी।


लौटा नहीं कभी जाकर बचपन एक बार,
मिन्नतें ख़ुदा से की हमने हज़ार बार,
लौटा नहीं वापस तीर-एजुबान,
घायल करके,हर एक बार।

 

एक खुशी के लिये पल-पल लुटाते गये,
खुशी हुई न हासिल मौत के करीब आ गये,
सहारा किसी का क्या खाक बने,
अपने लिये ही रोते रहे।

कभी न बढाये कदम आगे बढने को
और दोष किस्मत को देते गये
मौत भी आई तो देखकर लौट गयी, 
कहाँ ले जाऊँ इसे,
इसे तो दुनियादारी मार गयी!

खा-खा कर तरस खुद पर,
असहाय बना लिया,
अपने ही मन को खुद समझ लिया। 

बेनूर सी है जिन्दगी,नूर बर्षा दे ,
जितनी भी दे ऐ-ख़ुदा जिन्दगी,
बस मुस्कराने की अदा दे!


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