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द्वंद

द्वंद

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खुद का खुद से युद्ध है
मन में विचारों का द्वंद है
स्वतंन्त्रता के नाम पर हो रही नुमाइश जिस्मों की
मन अभी भी आदिकालीन है
हर तरफ नफरतों का फैला है अँधेरा
हर मन गमगीन है
न तोड़ने को बेड़ियाँ
झूठी परम्पराओं में ये ह्र्दय प्रतिबन्ध है
घर में बिछी महंगी कालीन है
पर मन बड़ा मलीन हो बिछा हर ओर
एक प्रपंच है होठों की कुटिल मुस्कान
विष से भी विषाक्त है
आंसुओं की कीमत मल-मूत्र से भी औंछि है...


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