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आज़ादी

आज़ादी

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मन, वचन, कर्म में जंग सी प्रतीत होती है
क्या आज़ादी ऐसी होती है?
आबो हवा है जकड़ी सी जंजीरों में
संकीर्ण है भावनाएं
लगे हुए हैं गिद्ध नौंचने में बहु-बेटीयाँ
दुश्वार है पग बढ़ाना
समाज की खोखली परंपराए है
सर उठाए चांद पर रख दिए हैं कदम
सोच पर दीमक लग गयी हैं
जाति-धर्म का नाग सर उठा रहा
आज़ादी का तिरंगा फहर रहा जकड़े हुए हैं
अंधविश्वास में चढ रही बलि
पाने को तरक्की पेट में क़त्ल हो रही बेटीयाँ
हर्शोउल्लास में चीख दब गई गरीब की
रो रही है आत्माएं आज़ादी पर
आहूती प्राणों की देने वालो की एक तरफ चीन,
खून पी रहा पाकिस्तान
कितने ही वीर सिपाही लील रहा
बेरोज़गारी की फौज है खतरे में
आज़ादी है कहा छुप जाए कहाँ असमंजस में आधी आबादी है क्या यह आज़ादी है?


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