अधूरा वादा
अधूरा वादा
माँ अक्सर सुनाती थी कहानियां।
उन कहानियों में जिक्र होता था एक छोटे से घर का।
बचपन में खेलते थे घर-घर,
उन्हीं छोटे से घर से बनी थी बुनियाद
एक अपना घर बनाने की।
माँ अक्सर पूछती थी
की बेटा बड़े होकर मुझे क्या देगा।
मैं खिलखिलाते हुए कह देता था।
माँ बड़ा सा घर दूँगा।
जिसमें तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी।
न दुःख होगा न दर्द होगा,
बस तुम खुश रहना।
माँ सर पर हाथ फेर देती थी।
और कहती मेरा 'राजा' बेटा!
मुझे मालूम है,तू जरूर देगा।
नादान था मैं,
दुनिया के संघर्ष से अनजान था मैं।
एक टीस जो सीने में रह-रहकर उठ जाती है।
माँ को दिया वचन याद आता है।
उसकी एक छोटी ख्वाहिश अभी भी अधूरी है।
उनका अपना सा सपना, सपने में आता है।
जीवन के अठ्ठाईस वसंत बीतने के बाद भी
अधूरा है इसकी याद दिलाता है।
एक दिन आएगा माँ,
मैं अपना वादा पूरा कर दूंगा।
तेरा दामन खुशियों से भर दूंगा।
तू भी गर्व से झूम उठोगी।
जब एक चाभी तेरे कदमों में रख दूंगा।
