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Dipak Kumar "Girja"

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Dipak Kumar "Girja"

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आशियाना

आशियाना

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मेरे वीरान जीवन में

उजाला बन के आये थे

कभी वो दिन भी थे

दिल में बस तुम ही समाये थे


मगर सब ख्वाब टूटे

और चकनाचूर हो बैठे

जो मिल के ख्वाब जीवन के

कभी हमने सजाए थे


मेरे दिल में किसी के

इश्क़ की जागीर रहती थी

बनेगी दिल की रानी वो

लकीरे मेरी कहती थी

मेरा उन पे भरोसा था

वो हमको आजमाए थे


मगर कुछ साल पहले

ना जाने क्या हुआ ऐसा

किसी के बाजुओं में आशियाना

वो बसाए थे


मैं कुछ भी ना समझ पाया

कि मुझको क्यों मिला धोखा

अचानक बेवफाई का कहा से

आया ये झोंका

ढह गया घर इश्क का

जो मिल के बनाये थे


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