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निमित्त
निमित्त
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© Urmila Prasad

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उस दिन सुबह-सुबह जैसे ही आरती स्कूल के दरवाजे पर पहुँची, वहाँ खड़ा एक लड़का उसका इन्तज़ार कर रहा था।उसने दौड़ कर आरती के पैर को छू कर प्रणाम किये।आरती को उसका चेहरा कुछ कुछ याद था, पर पूरा नहीं।वह असमंजस में थी। “मैं हूँ मैंम, ये देखिये,बच गया हूँ, आप की वजह से !” उसने अपने गले के दाग उसे दिखाये!  “उस दिन आप नहीं होती तो मेरा जाने क्या हुआ होता!” “ओ...अच्छा! तुम वही लड़के हो! ईश्वर का लाख-लाख शुक्र है! सब ऊपर वाले का रहम है! मै तो एक निमित्त(कारण) बन के वहाँ पहुँच गई थी!” आरती के चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट फैल गयी।

तीन महीने पहले शहर के शांत इलाके में सड़क के किनारे एक लड़का अचेतावस्था में पड़ा हुआ था। यही कोई बाईस तेईस साल, गोरा रंग, पैंट शर्ट और गले में मफलर लिपटा।राह चलती आरती उसे देख कर ठिठक गई थी। सब लोग अपनी धुन में आ जा रहे थे ।एक साइकिल सवार उधर से गुज़रा, उसने आरती को नसीहत दिया, “ये दारु के नशे में है!, जब होश आएगा तो अपने आप ही चला जाएगा!  आप जाइए!” पर आरती का जज्बात उसे वहाँ से हटने की इजाज़त न दी! उसने एक दूसरे आदमी से निवेदन किया, अगर ये नशे में है तो इसे थोड़ी ऊँची जगह लिटा दो, कहीं कोई वाहन न कुचल दे। आरती के कहने से दो लोग आये और मिल के उसे उठाने लगे। इस दौरान उसका मफलर एक तरफ सरक गया। लोग विस्मय से आह-सी कर उठे! उसके गले को धारदार अस्त्र से अंगुल भर काट कर उसे फेंका गया था, शरीर पीला पड़ गया था, सांस धीमी थी।आनन फानन में उसे अस्पताल पहुंचाया गया। अब आरती ने राहत की सांस ली, “चलो, अगर वह मर भी गया तो कम से कम डाक्टरों के बीच में मरेगा।” अगले दिन जब आरती उस इलाके से होकर गुज़र रही थी तो, लोगों ने हंस कर बताया कि वह लड़का बच गया है, उसे पच्चीस टाँके लगे हैं, तो आरती को खुद पर बड़ा फक्र हुआ!

निमित्त

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