Quotes New

Audio

Forum

Read

Contests


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
जिंदगी
जिंदगी
★★★★★

© Asima Bhatt

Others

2 Minutes   1.2K    2


Content Ranking

ज़िन्दगी फलसफ़ा नहीं हक़ीकत है

सवालों से परे अंतहीन इंतज़ार की तरह

हर पल कितना कुछ घटता है

अंदर बाहर

हर पल कुछ छूटता जाता है

हमारी साँसों की तरह

कहाँ ले पाते हैं वही अपनी छुटी हुई सांस दोबारा

कहाँ जी पाते हैं बिता हुआ दिन

रोज़ रोज़ कहाँ मिलता है

एक बीत हुआ जिया हुआ दिन

सम्बधों के बदलाव में कितना कुछ उलझा रहता है

सुलझाने की कोशिश एक लाचारी भर

कितना भी कुछ करो जीवन छूट ही जाता है

कितना भी कुछ करो और उलझ जाता है कोई दूसरा सिरा

छूटे हुए कुछ बेकार के प्रसगों में

जो ख़ाली बीयर की बोतल सी घर के किसी कोने में लुढ़की पड़ी होती है

सुबह फिर उठाकर मुंह से लगा लेते हैं

आख़री बूँद के लिए जैसे उसी में सब कुछ बचा था

या बचा होगा शायद

घूटा हुआ सा उबाऊ सा अजीब सा जो कुछ कुछ बचा रह जाता है

क्या

सच तो यह है अब जानना भी नहीं चाहते

क्या फ़र्क पड़ता है

कितना भी कुछ कर लो

जो छूट गया सो छूट गया

कहा होता या न कहा होता

वैसा किया होता या ऐसा किया होता

जाने दो क्या फ़र्क पड़ जाता

जाने दो न अब इन बातों में क्या रखा है

जाने दो

जैसा था ..... था

जैसा है ...... है

सांस लेना और सांस छोड़ना
एक शाम है

दूसरी अदद शाम की तलाश और इंतज़ार

जो गुज़रती जाती है हर शाम की तरह

किसी के इंतज़ार में

तमाम उम्र किसी का इंतज़ार करना और उसका लौट आना भी कोई मायने नहीं रखता

जहाँ बजती है

तन्हाई में बेग़म अख्तर और फरीदा खानम की ग़ज़ल

जिसे सुनते हुए फूट फूट कर रोना

और नहीं जान पाना कि किस बात पर रो रहे हैं

सवाल बरक़रार है

दरअसल जिदंगी तंग गली और खुला आकाश है .........

जिंदगी

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..