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अच्छी नहीं लगती....
अच्छी नहीं लगती....
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© Sanjay Maurya

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जहाँ का दर्द जो देखूँ ख़ुशी अच्छी नहीं लगती
ग़म ए बेदर्द की अब रौशनी अच्छी नहीं लगती

मज़ा है ज़िंदगी का तब तलक आवारगी जब तक,
हवाएँ बंद कमरों में कभी अच्छी नहीं लगती

ऐ मिट्टी के बने इन्सां तुझे गफ़लत हुई कैसी,
बता कब मौत से यह ज़िंदगी अच्छी नहीं लगती

सुकूँ मिलता नहीं इक पल बिना मय के मुझे साक़ी,
न छू लूँ लब से जब तक बेख़ुदी अच्छी नहीं लगती

ये सज़दे में झुके गर्दन न हो पाया कभी संजू,
मुझे संग-ए-खुदा की बंदगी अच्छी नहीं लगती

 

ग़ज़ल

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