यक्ष युधिष्ठिर संवाद
यक्ष युधिष्ठिर संवाद
कौरवों से द्यूतक्रीड़ा में हारकर पांडवों को बारह वर्ष वनवास में और एक वर्ष अज्ञातवास में काटना पड़ा। वनवास के बारहवें वर्ष में वे रमणीय द्वैत वन में निवास कर रहे थे। एक दिन उन्होंने एक ब्राह्मण के लिए पराक्रम करते हुए महान् क्लेश उठाया, परन्तु उसका भावी परिणाम सुखमय ही हुआ।
एक तपस्वी ब्राह्मण के अरणि एवं मन्थन काष्ठ का पता लगाने के लिए कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर धनुष लेकर भाईयों सहित मृग का पता लगाने के लिए दौड़े, जो मृग बड़े वेग से चौकड़ी भरता हुआ आश्रम से ओझल हो गया था।कुछ दूर जाने पर उन्हें मृग दिखाई दिया, किन्तु बाण छोड़ने पर भी वे उस मृग को नहीं बाँध सके। मृग हाथ नहीं लगा और सहसा अदृश्य हो गया। मृग को न देखकर पाण्डव हतोत्साह हो गये।
तत्पश्चात् उस गहन वन में भूख- प्यास से पीड़ित होकर पाण्डव एक शीतल छाया वाले बरगद के पास आकर बैठ गये।
तब सब भाइयों को थके- मॉंदे और प्यासे देखकर युधिष्ठिर ने पास के जलाशय से जल लाने के लिए नकुल को भेजा-“शीघ्र जाओ और तरकश में पानी भर लाओ ।”
नकुल शीघ्रता से गये और जलाशय के पास तुरन्त पहुँच गये। वहॉं स्वच्छ जल देखकर उसे पीने की इच्छा हुई। तभी उन्हें एक यक्ष की स्पष्ट वाणी सुनाई दी-“ सरोवर का पानी पीने का साहस न करो। इस पर मेरा अधिकार है। पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, फिर पानी पीओ और ले भी जाओ ।”
नकुल ने प्यासे होने के कारण यक्ष के कथन की अवहेलना की और वहॉं का शीतल जल पी लिया ,पीते ही वे अचेत होकर गिर गये।
नकुल के लौटने में विलम्ब हुआ तो युधिष्ठिर ने नकुल के सहोदर भाई सहदेव को जल लाने के लिए भेजा।वे पानी पीने कि लिए बढ़े तो उन्होंने भी आकाशवाणी सुनी कि पहले मेरे प्रश्नों के डउत्तर दो। पर उन्होंने भी उसकी अवहेलना कर पानी पी लिया और अचेत होकर गिर पड़े।
तब युधिष्ठिर ने पहले अर्जुन को फिर भीम को पानी लाने भेजा, पर उन्होंने भी आकाश की ओर से आती वाणी की अवहेलना कर जल पी लिया और पीते ही अचेत होकर गिर गये।
तदनन्तर बहुत देर तक सोच- विचार करके युधिष्ठिर उठे, और विशाल वन में प्रवेश करके सरोवर के पास गये। वहॉं उन्होंने अपने गौरवशाली भाईयों को निर्जीव की तरह पड़े देखा । वे गहरी चिन्ता में डूब गये और विलाप करने लगे । फिर यह विचार किया कि इन वीरों को किसने मार गिराया है।
युधिष्ठिर ने सोचा कि पानी पीकर इस रहस्य को समझने की चेष्टा करूँगा । ऐसा निश्चय कर वे जल में उतरे और पानी में प्रवेश करते ही उनके कानों में यक्ष की आकाशवाणी सुनाई दी-“ तात ! जल पीने का साहस न करना। मैं सेवार और मछली खानेवाला बगुला हूँ । इस जल पर मेरा अधिकार है। कुन्तीकुमार ! मेरे प्रश्नों का उत्तर दो। तब जल पीओ और ले भी जाओ।”
तब युधिष्ठिर ने कहा- “ मेरे भाईयों को किसने मार गिराया है? अतः बताइये आप यहॉं कौन विराज रहे हैं?”
तब यक्ष ने कहा-“ मैं जलचर पक्षी नहीं हूँ। यक्ष हूँ । तुम्हारे भाई मेरे द्वारा मारे गये।”
तब युधिष्ठिर उस यक्ष के पास जाकर खड़े हो गये, जो सूर्य के समान तेजस्वी और पर्वत के समान ऊँचा था। उसकी आवाज़ भी बहुत ऊँची और कठोर थी।
यक्ष ने कहा कि “तुम्हारे भाइयों को मैंने रोका था , पर वे बलपूर्वक जल ले जाना चाहते थे। यह जल मेरे अधिकार की वस्तु है। अतः जल लेने से पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो।”
युधिष्ठिर ने कहा -“तुम्हारे अधिकार की वस्तु मैं नहीं लेना चाहता। तुम मुझसे प्रश्न पूछो, मैं अपनी बुद्धि के अनुसार उत्तर दूंगा।”
यक्ष ने पूछा- “सूर्य को कौन उदित और अस्त करता है और वह किसमें प्रतिष्ठित है?”
युधिष्ठिर बोले- “ब्रह्म सूर्य को उदित करता है, धर्म अस्त करता है,और वह सत्य में प्रतिष्ठित है।”
प्रश्न-२ मनुष्य किससे बुद्धिमान् होता है?
उत्तर- वृद्ध पुरुषों की सेवा से बुद्धिमान् होता है।
प्रश्न-३ अचानक आये संकट से मनुष्य को कौन बचाता है?
उत्तर- साहस ही कठिन परिस्थितियों में साथ देता है।
प्रश्न-४ आग से तेज क्या है ?
उत्तर- क्रोध, जो अग्नि से भी अधिक तेज़ी से जला डालता है।
प्रश्न-५ सच्चा ब्राह्मण कौन है?
उत्तर- अच्छा चरित्र और आचार ही मनुष्य को ब्राह्मण बनाता है अतः प्रयत्नपूर्वक सदाचार की रक्षा करनी चाहिए।
प्रश्न-६ काजल से भी काला क्या है?
उत्तर- कलंक, काजल की कालिख को धोया जा सकता है, किन्तु चरित्र पर लगा धब्बा धोया नहीं जा सकता।
प्रश्न-७ दुनिया में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ?
उत्तर- प्रतिदिन मनुष्य मृत्यु देखकर भी जीवित रहना चाहता है, यही सबसे बड़ा आश्चर्य है।
प्रश्न८-किस शास्त्र को पढ़कर विद्वान् बना जा
सकता है ?
उत्तर- सिर्फ़ शास्त्रों का अध्ययन ही नहीं, विवेकी
व्यक्तियों का सत्संग ही विद्वान् बनाने में सक्षम
हैं।
प्रश्न-९ वायु से भी तेज गति किसकी है ?
उत्तर-मन वायु से भी तेज चलने वाला है ।
प्रश्न १०- पृथ्वी से भी भारी क्या है ? आकाश से भी
ऊँचा क्या है?
उत्तर- माता भूमि से भी भारी( बढ़कर )है, पिता
आकाश से भी ऊँचा है।
प्रश्न-११ मरने के बाद मनुष्य के साथ क्या जाता है ?
उत्तर- धर्म ।
प्रश्न -१२ लोक में श्रेष्ठ धर्म क्या है?
उत्तर- लोक में दया श्रेष्ठ धर्म है।
यक्ष ने और बहुत से प्रश्न पूछे, जिसके युधिष्ठिर ने ठीक उत्तर दिए। तो यक्ष ने कहा-“ तुमने मेरे सभी प्रश्नों के उत्तर ठीक- ठीक दे दिए। अब यह बताओ कि सबसे बड़ा धनी कौन है?
युधिष्ठिर बोले- जिसकी दृष्टि में प्रिय -अप्रिय, सुख- दुख और भूत- भविष्यत्-ये जोड़े समान हैं, वही सबसे धनी व्यक्ति है।जो निःस्पृह , शान्तचित्त, सुप्रसन्न और सदा योगयुक्त है, वही सब धनियों का स्वामी है।
यक्ष ने कहा - तुमने सबसे धनी व्यक्ति की ठीक - ठीक व्याख्या कर दी , इसलिए अपने भाइयों में से जिस एक को तुम चाहो, वही जीवित हो सकता है।
युधिष्ठिर बोले- यक्ष! यह श्यामवर्ण, अरुणनयन महाबाहु नकुल जीवित हो जाय।
यक्ष ने कहा- दस हजार हाथियों के समान बलवाले अपने प्रिय भीमसेन और अपने सबसे बड़े सहारे अर्जुन को छोड़कर तुम किसलिए अपने सौतेले भाई नकुल को जीवित कराना चाहते हो?
युधिष्ठिर बोले-यदि धर्म का नाश किया जाय तो वह नष्ट हुआ धर्म कर्त्ता को भी नष्ट कर देता है और यदि धर्म की रक्षा की जाय, तो वही कर्त्ता की भी रक्षा कर लेता है। वस्तुतः दया और समता ही परम धर्म है। मैं सबके प्रति समान भाव रखना चाहता हूँ इसलिए नकुल ही जीवित हो जाय।मेरी दोनों माताएँ कुन्ती और माद्री पुत्रवती बनी रहें, ऐसा मेरा विचार है।
यक्ष ने कहा-भरतश्रेष्ठ ! तुमने अर्थ और काम से भी अधिक दया और समता का आदर किया है, इसलिए तुम्हारे सभी भाई जीवित हो जायँ।
यक्ष के यह कहते ही सब पाण्डव उठकर खड़े हो गये और उनकी भूख प्यास जाती रही, वे नींद से सोकर उठों हुओं के समान स्वस्थ दिखाई देने लगे।
युधिष्ठिर बोलो- इस सरोवर में एक पैर से खड़े हुए आप कौन देवश्रेष्ठ हैं ?आप यक्ष ही हैं, ऐसा तो मुझे मालूम नहीं होता।आप हमारे कोई सुहृद् हैं अथवा पिता हैं ?
यक्ष ने कहा- मैं तुम्हारा पिता धर्मराज हूँ । और तुम्हारा व्यवहार जानने की इच्छा से ही यहॉं आया हूँ । तुम्हारी समदृष्टि के कारण मैं तुम पर प्रसन्न हूँ , अपना अभीष्ट वर मॉंग लो।
युधिष्ठिर बोले- यह वर मॉंगता हूँ कि जिस ब्राह्मण के अरणीसहित मन्थन काष्ठ को मृग लेकर भाग गया है, उसके अग्निहोत्र का लोप न हो।
यक्ष ने कहा- तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए मैं ही मृग रूप से वह लेकर भाग गया था, वह तुम्हें देता हूँ ।तुम कोई दूसरा वर माँग लो।
युधिष्ठिर बोले- हम बारह वर्ष वन में रहे। अब तेरहवॉं वर्ष अज्ञातवास लगा है, इसमें हमें कोई पहचान न सके।
यह सुनकर धर्मराज ने यह वर दिया और साथ ही यह वर भी दिया कि उनमें सब गुण बने रहेंगे ।
