यात्रा वर्णन
यात्रा वर्णन
यात्रा वर्णन हरिद्वार से श्री बद्रीनाथ
गृह जनपद हरिद्वार में रहते हुए भी ,कभी मन में विचार नहीं आया कि, श्री बद्रीनाथ जी के दर्शन किए जाएं । जो कि मेरे उत्तराखंड में ही स्थित है। ईश्वर की अनुकंपा रही कि मन में विचार आया कि, श्री बद्रीनाथ जी के दर्शन किए जाएं।
अतः बच्चों की छुट्टियां मई-जून 2018 में होने के कारण यात्रा को प्लान किया गया, अपनी कार को चुस्त-दुरुस्त किया गया ,उसकी सर्विस कराई गई ,स्टेपनी वगैरह बदली गई।
यात्रा 315 किलोमीटर पहाड़ी रास्ते की थी, इसलिए यह करना बहुत जरूरी था।
पहाड़ी रास्तों में गाड़ी चलाने का अनुभव भी नहीं था ,एक डर भी था इस कारण से हमने एक ड्राइवर को हायर किया।
गूगल मैप के अनुसार हमने यात्राओं के विभिन्न पड़ाव को भी देखा, जिससे कि हमें आसानी रहे कि हमें रास्तों में कहां पर रुकना है । क्योंकि 315 किलोमीटर लगातार कार चलाना सुरक्षित नहीं होगा।
अतः अपने ड्राइवर मित्र को हमने साथ लिया। यात्रा शनिवार सुबह 4:00 बजे आरंभ हुई हमने अपने साथ खाना खाने पीने की चीजें गर्म कपड़े ,साथ में रखें व बच्चों के लिए अलग से कपड़े की व्यवस्था अपने साथ की।
ड्राइवर को पहले भी अनुभव था तो उसने हमें इन चीजों के लिए पहले ही तैयार कर दिया था।
श्री हरिद्वार से यात्रा आरंभ करने के बाद हम रायवाला से होते हुए ऋषिकेश पहुंचे । ऋषिकेश से हमारी यात्रा पहाड़ी रास्तों से होना आरंभ हुई ऋषिकेश से लगभग लगभग 75 किलोमीटर दूर हम देवप्रयाग पहुंचे जहां पर अलकनंदा और भागीरथी का संगम होता है और इन दोनों नदियों को मिलकर ही गंगा बनती है।
यहां पर हमने नाश्ता वगैरह किया ,चाय पिया और हमें पहाड़ी चोटियों का दर्शन होना शुरू हो गया था, जो कि शहरों की स्थितियों से एकदम अलग था।
देवप्रयाग से चलते हुए लगभग 38 किलोमीटर शहर श्रीनगर पहुंचे जहां पर हमने रात्रि विश्राम किया। हुआ कुछ घरेलू सामान जो घर पर लेना भूल गए थे खरीदा।
सुबह जल्दी निकले, क्योंकि हमें बद्रीनाथ के दर्शन करने थे ,जल्दी निकले और हम वहां से चलते हुए लगभग 34 किलोमीटर रुद्रप्रयाग पहुंचे जहां पर अलकनंदा व केदारनाथ से आई नदी मंदाकिनी का संगम होता है । और इसी स्थान से श्रीनगर व केदारनाथ धाम का रास्ता अलग होता है। यहां से लगभग 50 किलोमीटर दूर गोचर एक सुंदर छोटा शहर से होते हुए ,हम जोशीमठ जो कि जो 115 किलोमीटर था पहुंचे। जोशीमठ शहर को आदि शंकराचार्य जी ने बसाया था और जोशीमठ में नरसिंह मंदिर एक प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल भी है।
नरसिंह मंदिर में मुख्य मूर्ति जो आधा शेर और आधा आदमी के रूप में स्थिपित है, जो भगवान विष्णु के चौथे अवतार है।
सर्दियों के समय में भगवान जी की बद्रीविशाल जी की प्रतिमा को जोशीमठ में ही प्रवास के लिए रखा जाता है। समुद्र तल से बद्रीनाथ जी की ऊंचाई 10,000 फीट से अधिक है जिस कारण से वहां 6 महीने भर बर्फ पड़ी रहती है। हम इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि मसूरी की ऊंचाई समुद्र तल से 6500 फीट के आसपास है, और सर्दियों में वहां बहुत ठंडा होता है ।
जोशीमठ से 30 किलोमीटर दूर गोविंदघाट पहुंचे जहां से बद्रीनाथ जी का और फूलों की घाटी का जो सिक्खों का पवित्र स्थान है, रास्ता अलग होता है।
यहां से 25 किलोमीटर दूर बद्रीनाथ जी के मंदिर हम पहुंचे। इस संपूर्ण यात्रा में यहां के टेढ़ी-मेढ़ी रास्तों में ऊंचे देवदार के वृक्ष और भरपूर हरियाली को देख कर ,मन प्रफुल्लित व प्रसन्न निश्चित होता रहा। बद्रीनाथ जी पहुंच कर हमने धर्मशाला में एक कमरा लिया, रात में हमें दो-दो रजाई ओढ़नी पड़ी क्योंकि बहुत ठंडा था।
दो छोटे बच्चे भी साथ में थे, हमने नहाने के लिए गर्म पानी की बाल्टियाँ वहां के धर्मशाला के व्यक्ति से मंगाई।
हमें बाद में मालूम चला कि पास में ही तप्त कुंड है । जिसमें गर्म पानी अपने आप आता रहता है। आप वहां से पानी लेकर नहा सकते हैं।
सुबह मंदिर दर्शन के लिए ,नंगे पैर हम मंदिर प्रांगण में खड़े हुए । हम सब के पैर के तलवों में कंपकंपी छूटने लगी, बीच-बीच में हम गर्म पानी से पैरों को धोते रहे।
भगवान बद्रीनाथ का मंदिर नर और नारायण पर्वतों के बीच में स्थित है ,जो विष्णु भगवान जी का अवतार रूप में मंदिर में प्रतिष्ठित है। यहां के पुजारी को रावल कहा जाता है ,जो कि दक्षिण भारतीय होते हैं। यहां के धाम की बहुत ही मान्यता है। मान्यता यह है ,श्री बद्रीनाथ जी के दर्शन से पहले, आप यमुनोत्री, गंगोत्री और केदारनाथ जी के दर्शन कर आए हो । लेकिन हम ऐसा नहीं कर पाए, क्योंकि चारों दर्शन एक साथ छोटे बच्चों के साथ दर्शन करना थोड़ा कठिन कार्य है। हम श्री बद्रीनाथ जी के दर्शन के लिए पहले आ गए। बद्रीनाथ मंदिर में हिंदू धर्म के देवता विष्णु के एक रूप "बद्रीनारायण" की पूजा होती है।
पूजा की थाली लेकर हम पंक्ति मैं लगकर दर्शन किये।
हम सब लोग बार-बार आसपास की पहाड़ियों पर पड़ी बर्फ को ही निहारते रहे । दर्शन करने के पश्चात जो एक असीम शांति प्राप्त हुई रास्तों की ,कठिनाइयां और ठंड जैसे छूमंतर हो गई। दर्शन से पहले हमने तप्त कुंड में स्नान किया जैसे कि घर के गीजर से निकले पानी से स्नान कर रहे हो। लोग वहां पर कपड़े में बांधकर चावल और दाल बांधकर पानी में छोड़ा हुआ था ताकि वह पक जाए। वहां से हम लोगों का भीम पुल पैदल चलकर गए जो एक ही शीला से पत्थर से बना है वहां पर हमने सेल्फी या फोटो खिंचवा आए। और भारत तिब्बत सीमा का आखिरी गांव माणा गांव की आखरी चाय की दुकान पर भी हमने यादगार सेल्फी और फोटो खींचे।
गांव के लोगों का रहन सहन और पहनावा देखा व उनके साथ फोटो खिंचवाई। बाजार से कुछ खरीदारी करने के पश्चात हम लोग वहां से सकुशल वापस चल दिए। दर्शन करने के पश्चात पहाड़ी रास्तों की, थकान व उल्टियां जैसे सब छूमंतर हो गई थी ।
हमें कहीं भी कुछ ऐसा एहसास नहीं हुआ कि हम किसी अनजान जगह पर जा रहे हो । शायद अपना प्रदेश होने के कारण ऐसा रहा या यहां के लोगों की सादगी व सीधा सपाट रास्ता भी कारण रहा हो। क्योंकि यातायात सीमित रहता है ,इसलिए किसी तरह की परेशानियां हमें नहीं हुई। खाने पीने रहने की लगभग सभी मूलभूत सुविधाएं पूरे रास्ते पर हमें दिखाई दी।
मुझे अब तक की सबसे अच्छी शिक्षा, यात्रा के माध्यम से मिली। – लिसा लिंग
जय बद्री विशाल
