शहद निकालने वाले से शिक्षा-१४
शहद निकालने वाले से शिक्षा-१४
अवधूत दत्तात्रेय अपनी मौज में विरक्त होकर अरण्य में घूम रहे थे ,वहॉं बहुत सुन्दर फूल थे। उन फूलों पर सुन्दर सुन्दर तितलियों घूम रहीं थी। तितली एक फूल पर बैठती, धीरे से उसका रस लेती और उड़ जाती। अनवरत यह देखते देखते दत्तात्रेय जी ध्यानमग्न हो गये। सोचने लगे कि ये तितलियॉं कितना परिश्रम करती हैं। एक फूल पर धीरे से बैठती हैं, और उड़ जाती हैं, फूल को महसूस भी नहीं होता कि कुछ लिया गया है।
कुछ आवाज़ से ध्यान टूटने पर उन्होंने देखा कि कुछ व्यक्ति जंगल में घूम रहे थे और ऐसा लगता था कि कुछ खोज रहे थे । फिर एक पेड़ पर उन्हें मधुमक्खी का छत्ता दिखाई दिया। वे व्यक्ति वहीं बढ़ गये और शहद के लालच में छत्ता तोड़ने का उपक्रम करने लगे। वे शहद निकालनेवाले मधुहारा थे।
थोड़ी देर के परिश्रम के बाद उन्होंने धुआँ कर मधुमक्खियों को भगाकर वह छत्ता तोड़ ही लिया। और शहद भरा वह छत्ता लेकर शहद निकाल लिया। बेचारी मधुमक्खियॉं! उनका परिश्रम से संचित मधु लूट लिया गया।
यह देखकर दत्तात्रेय जी ने यह शिक्षा ली कि धन का या भोजन का संचय नहीं करना चाहिये। मेहनत से किया हुआ संचय नष्ट हो जाता है।
छह मधुमक्खियाँ पूरे जीवन में एक चम्मच शहद बना पाती हैं। और इसके लिए लाखों मील की यात्रा करती हैं। एक मधु मक्खी क़रीब बीस लाख फूलों का रस लेती है। मधुमक्खियॉं आधा सेर शहद बनाने के लिए क़रीब पचास हज़ार मील( अस्सी हज़ार किलोमीटर) उड़ती हैं, अर्थात् दुनिया भर में दो बार से अधिक चक्कर लगाने के बराबर यात्रा करती हैं।
भ्रमर द्योतक है उस मधुमक्खी का जो एक फूल से दूसरे फूल पर मंडराती रहती है। जबकि मक्षिका वह मधुमक्खी है जो छत्ते में बड़े ही लगाव से अधिकाधिक शहद संचित करती है।साधु संत को भ्रमर की तरह होना चाहिए क्योंकि यदि वह मक्षिका का अनुसरण करता है तो उसका संचय नष्ट हो जाएगा।
शहद निकालने वाले से अवधूत दत्तात्रेय को यह शिक्षा मिली कि साधु संत को उसी दिन या अगले दिन खाने के लिए भी भोजन का संग्रह नहीं करना चाहिए ।यदि वह इस आदेश की अवहेलना करता है और मधुमक्खी की तरह अधिक से अधिक स्वादिष्ट भोजन एकत्र करता है ,तो उसने जो कुछ एकत्र किया है वह संग्रह उसे अवश्य ही नष्ट कर देगा।
