सबकी सेवा
सबकी सेवा
ओ सेठ जी का करते हो ?
अरे भाई रामदीन! कहाँ के सेठ, नौकर हई, देखभाल करने के लिए ।
तो क्या हुआ ! मालिक तो रोज आते नहीं, तुम्ही मालिक हो । अच्छा है तुम्हरा काम बैठे बैठे रहकर आदेश देना है बस ।
हमर काम तो भागदौड़ का है । सबके लिए सेवा करते रहते हैं ।
आज अपना काम लेकर शहर गये थे आफिसर फरमा दिए इतना पैसा लगेगा । कैसा जमाना आ गया ।
तु भी तो वही काम करत हो । भोले भाले गाँव के लोंगो का काम पैसा लेकर करत हो । बीस के बदले दो सौ रूपये !
हीही ही
सेठ जी भी कुटिल मुस्कान दे दिए । सोचने लगे कि हम तो दुकान पर बैठे बैठे इससे ज्यादा कमा लेते हैं।
