प्रणव कुमार

Others


2  

प्रणव कुमार

Others


"सैनिटाइज्ड व्यंग"

"सैनिटाइज्ड व्यंग"

4 mins 3.2K 4 mins 3.2K


अद्भुत मित्रों! राष्ट्रों की सीमाएं लांघ चुका है यह वायरस न।आतंकियों के बंदूक बंद हैं, धार्मिक ठेकेदारों के धंधा अर्थात् मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा बंद हैं। किन्तु टीवी पर आतंक जारी है वहां रोज लड़ाई चल रही है कोरोना पर नहीं धर्म पर।

मॉल, पब, होटल, बाजार के ऊपर अस्पताल की महत्ता भारी पड़ रही है।एक सुई, एक थर्मामीटर, एक स्टेथेस्कोप सारे मिसाइल, गन, बॉम्ब, अंतरिक्ष यान, हथियार पर भारी हैं।जो भक्त कल तक भगवान के भरोसे थे आज भगवान उनके भरोसे हैं। मंदिरों में सन्नाटा छाया है माइक पर आरती हो रही है ताकि उनको भी सचेत रहने का संदेश दिया जा सके। नमाज़ पढ़ने वालों की भी अलग भीड़ है उनको जिंदा रहने से ज्यादा मरने के बाद की चिंता है। वहां भी लाउडस्पीकर जोड़ों पर है किन्तु समस्या ये है कि सब अपनी कान बंद कर सैनिटाइज होकर लॉकडाउन हो गए हैं। 

सारे छैला, मनचले, लंपट , मंजनू घरों में कैद हैं। बहुत सारी हरकतें बंद हो गई है अपराध कम होने की वजह से समाज का संतुलन बिगड़ चुका है।

और इन सबके बीच इस वायरस से लड़ने की तैयारियों के बजाय हर रविवार सरकार द्वारा टास्क दिया जा रहा है और पूरा देश वाजिब सवाल पूछने के बजाय बिगबोस की तरह टास्क पूरा करने में लग जाता हैं और अगली टास्क का मांग भी कर डालता हैं। असल में प्रकृति को मनुष्य की प्रवृत्ति पर विजय पानी थी इसीलिए उन्होंने इस वायरस का सहारा लिया। मनुष्य अपने मनुष्यता को टीवी के रिमोट में सेट कर चुका है और उसके अनुसार काम कर रहा है। उन्हें मज़ा आ रहा है टीवी की लड़ाइयों में इसीलिए हम इस वायरस की लड़ाई में पीछे जा रहे हैं। उधर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में एक अलग ही क्लास चल रही है चैलेंजेस के इसमें अपना फेसबुक यूनिवर्सिटी भी पीछे नहीं है। सब कोरोना से निश्चिंत होकर दाढ़ी, बाल, साड़ी, करैक्टर मैच चैलेंज खेलने में लगे हैं ।

पत्नियां काफी हो चालाक चुकी हैं इस वायरस के चलते पति से बार - बार हाथ धुलवाती हैं और इसी बहाने घर के सारे बर्तन भी साफ करवा लेती हैं।प्रेमी युगल की भी एक अलग हीं तरप है व्हाट्सएप पर मिल नहीं सकते और मिलने बाहर जाएं तो पुलिस वाले एक अलग हीं जगह से प्रेम करवा देते हैं और फिर सारे कपोल- कल्पना एक झटके में ख़त्म कर देते हैं।

जो कुछ हो इस वायरस ने हमें कुछ अंग्रेजी शब्द जरूर सीखा दिए जैसे क्वारंटाइन, एपिडेमिक, लॉक डाउन.

उधर लेखकों, कवियों में कॉपीराइट की एक अलग लड़ाई छिड़ी है। सब खुदको शेक्सपियर बताने से थक नहीं रहे हैं। बॉलीवुड भी पुराने एवरग्रीन गानों के रीमिक्स बनाकर नेवरग्रीन कर एक अलग वायरस फैला रहा है। टिक टोक पर कोरोना वायरस की वैक्सीन का भी खोज हो चुका है। वहां कुछ सस्ते ग़ालिब भी हैं जिनकी अलग दुनिया है और उनके दुख भी अलग हैं जो आम आदमी के समझ के परे है। कोरोना के साथ - साथ टिक टोक नाम के वायरस से भी लड़ने की जरूरत है। वॉट्सएप फॉरवर्ड मैसेजेस भी एक संक्रमित वायरस जैसी है इससे अगर कोई भी पॉजिटिव टेस्टेड पाया गया तो फिर वह सेल्फ आइसोलेशन के बजाय धड़ाधड़ १० लोगों को भेजकर उसे संक्रमित कर देते हैं फिर वो १० लोग अगले १० लोगों को ऐसे हीं एक वायरस का चेन बन जाता जिससे सब संक्रमित हो जाते हैं और वहां आई सारी चीजें सर्वमान्य हो जाती हैं फिर ऐसे लोग खुदको इंटेलेक्चुअल समझ कूद पड़ते हैं डिबेट्स में जहां वो किसी की नहीं सुनते सिवाय अपने व्हाट्सएप ज्ञान के। वहीं कुछ धन्ना सेठ डोनेशन के बजाय २० सेकेंड में हाथ धोने के तरीके बता रहे हैं जो आज काफी नहीं है।

जनता के तो कई जरूरी मांग हैं पर सरकार बस रामायण प्रसारित करवाने में हीं सक्षम है।

सरकार के हर फैसले को भक्तगण मास्टरस्ट्रोक बता देते हैं इससे परेशान होकर ' मास्टरस्ट्रोक ' ने योगीजी के मंत्रालय में अपना नाम बदलवाने कि अर्जी डाल चुका है। कुछ नेतागण इस वायरस को भगाने के लिए विश्वप्रसिद्ध नारे भी दिए जिसको आनेवाले समय में भक्तगण ' रेवोल्यूशनरी स्लोगन ' कहेंगे।

और भक्तों की हरकतों पर क्या कहें जनता कर्फ्यू के समर्थन में भी रैली निकाल देते हैं।और अंत में हमें इस लॉकडाउन में तय करना है कि हमारी लड़ाइयां किससे हैं।

हमारी लड़ाई धर्म के धंधे से, टीवी के वायरस से, व्हाट्सएप, फेसबुक की गन्दगी से, वातावरण ख़त्म होने से बचाने में, इंसानियत को मिटने से, चिंटू पत्रकारों से और निरंकुश शासन से है।

कोरोना महामारी के इस दौर में अफ़वाह खबर बनकर फैल रही है और खबर अफ़वाह बनकर।

सचेत रहें, सुरक्षित रहें और ' सैनिटाइज्ड व्यंग ' पढ़ते रहें।।

    


Rate this content
Log in