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Kumar Ritu Raj

Children Stories


4.2  

Kumar Ritu Raj

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फटी जेब

फटी जेब

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बस ये मत पूछो कैसे बस सुनो कहानी जो था कुछ ऐसे बात उस समय की थी जब मैं बहुत छोटा था। इतना की मेरे हाथ में चंद खुल्ला ही आ सकते थे। पर खुल्ला गिनने आते थे मुझे। वो छोटे रुपये वो बड़े रुपये सभी समझ जाता था। हाँ कुछ कपड़े की समझ नहीं थी मुझे इसीलिए कभी भी कुछ भी पहन के चला जाता था।

हमारे घर से कुछ अधिक ही दूरी एक मेला लगा था। मुझे वहां जाने और माता जी को मनाने के लिए ना जाने कितने ही बार जमीन पर लेटने परे थे। वैसे और भी बहुत कुछ करने परे मेला के बहाने।

दादी से मेला के बहाने 1 रुपये 25 पैसे, दादा से 2 रुपये, पापा से 3 रुपये 50 पैसे, माँ से 1 रुपये 75 पैसे और चाचा से 2 रुपये 50 पैसे लिए। पूरे 11 रुपये ले मैं अपने दोस्तों के साथ मेला देखने चल दिया।

रास्ते में हमारी बातें जरी रही क्या क्या खरीदना हैं। कोई पतंग तो कोई गाड़ी तो कोई मिठाई बस फिर क्या था हमारे पैर और तेजी से बढ़ने लगे। मै अपनी छोटे हाथ में 11 रुपये ले खेलता जा रहा था। सोहन ने कहा "तू अपना रुपया जेब में रख ले पता नै कब पहुच जैबे और तोहर हराय गेलो ते ?" मैने भी जेब में रख लिया।

मेला पहुंचते ही पहला ठेला रामू काका का था। सबने कुछ खरीदा पर मैने देखा भी नहीं क्योंकि उसने मुझे पिछले साल आम के लिए पिता था। फिर हम आगे गए मैने हेलीकॉप्टर खरीदने की बात की सभी विचार करने लगे पूरे 10 मिनटों के बाद ये निर्णय हुआ ये नहीं लेना हैं। हम फिर आगे गए सोहन ने कहा आज मेला झुलाने के बारी उसकी हैं। बस फिर क्या था सब झूले पर चढ़ खूब मजे किए।

काफी देर हो चूका था अब घर भी लोटना था। थोड़ी दूर आगे मुझे एक गाड़ी पसंद आ गई मैने बिना किसी को कहे बिना ही मैने सामान खरीदने की कोशिश की। क्या पता कोई फिर कह दे बेकार है। ओह ये क्या हुआ मेरे जेब खाली थे। ये तो फटी जेब वाली पेंट था, फिर क्या था मेंने रोना शुरु कर दिया। सब ने रोने का कारण पूछा सारी कहानी मई रोते रोते सुनाई फिर क्या था कुछ की हँसी निकल गई और कुछ ढूढने लगे। फिर सब ने कुछ कुछ रुपये लगा मुझे वो गाड़ी खरीद दिए।

अंत मैं घर पंहुचा सबको लगा मैने मेला में 11 रुपये के ये गाड़ी खरीदी। मैंने भी सबों को यही बताया और सोचता रहा वो फटी जेब हाय रे मेरी फटी जेब।


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