ऑनलाईन राखी
ऑनलाईन राखी
"वह भी क्या दिन थे जब हम अपने बचपन में राखी का त्यौहार मनाया करते थे । बहने सुबह से उपवास रखती । फिर जब मुहूर्त आने को होता , राखी बांधने का , तो आंगन में चौक पूरा जाता । चौकी पर भाई को बिठाकर आरती की थाली सजा कर , रोली - अक्षत का टीका करके , राखी बांधी जाती । नारियल देकर , मुंह मीठा किया जाता । और भाई बड़े स्नेह से , सम्मान से बहन को कोई उपहार देता । जिसे पाकर वह फूली न समाती । और हाँ गेहूँ के जवारे भी बोए जाते थे । शाम को नदी - तालाब किनारे तो मेला- सा लग जाता । जब सभी महिलाएं सज- धज भुजरियाँ सिराने जाती । " - दादी मां बता रही थी अपने जमाने की बातें कि राखी का त्योहार कैसे मनाया जाता था ।
" हम तो आजकल ऑनलाइन ही भेज देते हैं । इतना समय ही कहां है किसी के पास । और सब अपने - अपने कामों में व्यस्त भी रहते हैं । और इसी कारण दूर - दूर भी रहने को मजबूर होते हैं , देस तो देस, कई बार तो विदेश में भी। भाई भी , बहन भी । तो ऑनलाइन राखी भेज दी हमने तो । आजकल की तो यही रीत है , यही चलन है आज का । उधर से भाई ने भी यूपीआई से रुपए भेज दिए या कोई गिफ्ट ऑनलाइन से ही भेज दिया । लीजिए मन गई राखी । मिठाइयां वगैरह भी इसी तरह भेज देते हैं हम तो ।" - टेक्नो सेवी पोती बोली।
"अरे! बिन मिले ही एक - दूसरे से ! राखी मन गई।" - दादी मां हतप्रभ थीं ।
