'मेस' पर चर्चा
'मेस' पर चर्चा
(चौराहा -- शाम का वक्त -- आसमान में घने बादल छाये हुए हैं। भांगूमल और रफिक बातचीत करते हुए...)
भांगूमल -- अरे, परखू ने बिस्तर पकड़ लिया रे !!! उसका वजन छह किलोग्राम घट गया ।
रफिक -- ये कैसे हुआ, भैया ? परखू तो बड़ा हट्टा-कट्टा और तंदुरुस्त था...हर शाम 'डियुटी' खत्म कर अपनी फटफटिया निकालकर शाम की चाय पीने गाँव से बाहर निकला करता था...
(बीच में ही उसकी बात काटते हुए)
भांगूमल -- अरे, 'मेस' में रुपये देकर भी जब हर दिन घटिया किस्म का खाना खाने को मिलेगा, तो आदमी बिमार न पड़कर क्या 'ताशा' बजाएगा...??? (गुस्सैल मुद्रा में)
रफिक (भांगूमल से) -- इसका वजह क्या है, भांगू भैया? ऐसी हालत क्यों हुई परखू की? (अधिर भाव में आग्रह दिखाते हुए)
भांगूमल (उसी गुस्सैल मुद्रा में) -- सबसे बड़ा बेईमान तो डांके है, जिसके हाथ में 'मेस' का पूरा दायित्व है। और तो और, ऊपर बैठे बड़े अफसर भी उसकी 'हाँ' में 'हाँ' मिलाते फिरते हैं। तभी तो, जनाब बेफिक्र अपना गोरखधंधा चलाता आ रहा है...! और जब तक उसको ऊपरवाले की चोट नहीं मिलती है, वो यूँ ही 'कंजूसी' के इम्तिहान में अव्वल नंबर से 'पास' होता रहेगा...! एक नंबर का बेईमान है वो...!!! आए दिन 'रसोइया' काम छोड़कर चला जाता है। जब उन्हें
सही मेहनताना नहीं मिलता, तो क्या वो 'खाक' छानने को 'मेस' की नौकरी करेंगे...??? इतनी मनमर्ज़ी क्यों??? उसमें शायद ज़रा-सी भी इंसानियत बाकी नहीं, तभी तो वो हरेक 'मुफलिस' पर बेइंतहा ज़ूल्म-ओ-सितम ढा रहा है...!!!
रफिक (अफसोस जताते हुए) -- क्या ज़माना आ गया है, भैया, बेईमानों से भरा पूरा बाज़ार है! यहाँ ईमान-धर्म की कोई बिसात ही नहीं...!!! ओ ऊपरवाले! (आसमान की तरफ देखता हुआ) -- ज़रा लाचार लोगों पर भी रहम-ओ-करम हो...!!!
(मोबाइल फोन की घंटी बजती है)
भांगूमल (बहुत सम्मान के साथ) -- जी, साहब! मैं अभी हाज़िर हुआ।
(पर्दा गिरता है)
