Ram Chandar Azad

Others


4.7  

Ram Chandar Azad

Others


जान बची तो लाखों पाए

जान बची तो लाखों पाए

5 mins 1.6K 5 mins 1.6K

          

सावन का महीना था। पिछले दो तीन दिनों से सावन की फुहारें नहीं पड़ रहीं थी। मौसम साफ था। धूप होने के कारण लोग राहत महसूस कर रहे थे। सावन के झूले पड़ चुके थे। गाँव में पेड़ की शाखाओं पर बच्चों ने झूले डाल रखे थे जिस पर झूलते हुए औरतें सावन के गीत गाती थीं। खेतों से थकी-मादी औरतें वापस लौटतीं तो उस पर झूलती, गीत गाती और उनकी थकान दूर हो जाती।

आज तो सभी के घरों में ख़ुशी का माहौल था क्योंकि आज जो नागपंचमी थी। आज के दिन नागदेवता को खुश करने के लिए औरतें व्रत और उपवास रखतीं। घरों में आज पकवान और मिष्ठान बन रहे थे। आज लोग अपने-अपने बैलों को तालाब में नहलाने के लिए ले जा रहे थे। तालाब गाँव के पास ही स्थित था जो वर्षा होने के कारण जल से लबालब भरा हुआ था। मेरे मन में विचार आया कि मैं भी अपने बैलों को नहलाने के लिए ले जाऊँ।

मैंने भाई से पूछा-“क्या हम भी अपने बैलों को नहलाने के लिए ले जाएँ ?” भाई ने पहले तो मना कर दिया, फिर दोबारा से मैंने कहा-“ मैं और शंकर दोनों पगहिया पकड़कर ले जायेंगे। सभी लोग अपने-अपने बैलों को नहलाने के लिए ले जा रहे हैं। ”

बैल हमारे बहुत सीधे थे। जैसे उन्होंने मारना सीखा ही नहीं हो। हम उनके ऊपर लेटते। उनके नीचे से निकलते। वे हमारे कंधे पर अपना मुँह रख देते। हमारे हाथ-हथेली चाटते मगर मजाल कि वे हमें भूलकर भी सींग दिखा दें। हम उन्हें रोटी खिलाते, पानी पिलाते। शायद इसी वजह से वे हमें बहुत चाहते थे। हम अपने बैलों को बहुत प्यार करते थे। कुछ सोचकर भाई ने कहा-“ अच्छा, तुम दोनों बैलों को पगहिया पकड़कर ले चलो। मैं अभी आता हूँ। सावधानी से ले जाना, देखना कहीं इधर-उधर खिंचाकर भागे न। ”

हमने बैलों को खूंटे से खोल लिया और सड़क से होते गुए पोखर पर जा पहुँचे। लोग अपने-अपने बैलों को नहला रहे थे। हमने भी अपने बैलों को पानी में घुसाया जैसे बैलों को भी मजा आ रहा हो। हमने बैलों को नहलाकर छोड़ दिया। और वे किनारे पर जाकर घास चरने लगे।

गाँव के चार-पाँच लड़के पोखर में नहा रहे थे। अब हम भी कमर भर पानी में घुस कर नहाने लगे क्योंकि हमें तैरना नहीं आता था। दूसरे लड़के समझाते थे कि हमें तैरना आता है इसलिए एक लड़के ने मेरा हाथ पकड़कर खींच लिया। जैसे ही मैं गहरे पानी में पहुँचा मैं डूबने लगा। एक बार ऊपर आने के बाद मैं नीचे चला गया। उसने समझा कि मैंने डुबकी लगा रखी है। परन्तु मेरी हालत पतली हो चली थी। ऐसे लगता था कि जैसे मौत साक्षात सामने खड़ी हो। तभी मैं एक बार फिर ऊपर आया और जल भरी साँस के साथ नीचे चला गया।

भगवान के करिश्मे बड़े अजीब होते हैं। वह मुर्दे को भी जिन्दा कर सकता है। रुकी साँसों में भी गति के रूप में उपस्थित हो जाता है। धमनियों में रक्त बनकर प्रवाहित होने लगता है। वह किसी न किसी रूप में अपने बन्दे को सहायता के लिए भेज देता है। बचने का कोई चारा न देखकर मेरे ह्रदय से भी करुण पुकार अकस्मात् निकल पड़ी और उसने मुझे बचाने के लिए किसी और कोई नहीं, खुद मेरे भाई को भेज दिया हो। उन्होंने मुझे डूबते हुए देखा तो उनके तो होश उड़ गए। उन्होंने आव देखी न ताव पोखर में छलाँग लगा दी। और पलक झपकते मेरे पास पहुँच गए।

मरता क्या नहीं करता अर्थात यदि उसे तिनके का भी सहारा मिल जाए तो उसे कतई हाथ से नहीं जाने देगा। किसी ने कहा भी है कि डूबते को तिनके का सहारा। जैसे ही मैंने उन्हें पाया मानो मेरे प्राण मुझ में वापस आ गए। मैंने उन्हें कसकर पकड़ लिया जिससे कि कहीं वे छूट न जाय। मैं एक बार पुनः ऊपर आया परन्तु मेरी पकड़ के कारण उनका तैरना बंद हो गया जिसके कारण मेरे साथ वे भी डूबने लगे। उन्हें लगा की इसके साथ मेरी भी जीवन-लीला समाप्त हो जायेगी। अब न तो यह बचेगा और न मैं ही। उन्होंने मेरे पेट पर एक लात जोर से मारी जिससे मैं और भी गहरे पानी में चला गया और डूबने लगा। लेकिन इस दौरान जब मैं ऊपर आ गया था तो मुझे थोड़ी साँस लेने का अवसर मिल गया था। अब मुझे विश्वास हो गया था कि मेरे भाई मुझे अवश्य बचा लेंगे।

भाई ने बाहर निकल कर ज़ोर से आवाज़ लगाई-“बचाओ...बचाओ...बचाओ...”

उनकी आवाज़ सुनकर वहां तमाम लोग जमा हो गए। फिर उनमें से कुछ लोग पानी में तैर कर मेरे पास तुरंत पहुँचे। इस बार वे मेरे पास नहीं आये बल्कि दूर से ही उन्होंने मेरे हाथों तक लाठी पहुँचाई। मैंने ऐसा अवसर गँवाना उचित नहीं समझा। फिर जिस व्यक्ति के प्राण छूटनेवाले हों, भला वह लाठी को कैसे छूटने देता। ठीक वैसा ही मैंने भी किया। लाठी को मैंने बड़ी मज़बूती के साथ पकड़ लिया जिससे वह छूट न सके। उन लोगों ने पकड़कर मुझे खींचा जिससे मैं किनारे पहुँच गया। कुछ लोग कहने लगे कि इतना बड़ा हो गया तुमने तैरना क्यों नहीं सीखा? तुमसे तो छोटे-छोटे लड़के तैरना जानते हैं। तुम्हें भी तैरना आना चाहिए। मैं उन सबकी बातें किंकर्तव्यविमूढ़ होकर सुन रहा था।

कोई शिकवा न कोई शिकायत। भाई ने मेरी तरफ देखा। मैंने भाई की तरफ। मेरी आँखों से जल की धारा बह निकली। भाई ने मुझे गले से लगा लिया। मेरे आँसुओं ने उनकी आँखों को भी नम कर दिया।

अब तक मेरी धड़कने सामान्य हो गयी थी। अब मेरी साँसे मानो वापस लौट आईं हो। डूबते समय मैंने एक-दो घूँट पानी भी पी लिया था परन्तु मैं सामान्य था। सिर में थोड़ी भन्नाहट थी। भारीपन था। लेकिन फिर भी मैं ठीक था क्योंकि भगवान का भेजा हुआ दूत मेरा भाई मेरे सामने था। उसने मेरे हाथ पकड़े और मैं उसके इशारे पर घर की ओर चल दिया।     

           



Rate this content
Log in