होनहार बिरवान के होत चीकने पात (भाग-४)
होनहार बिरवान के होत चीकने पात (भाग-४)
एक बार चार-पॉंच वर्षीया अनीशा अपनी बहिन के साथ अपनी मौसी के यहॉं आई हुई थी। तब एक दिन अप्पूघर देखने जाने का प्रोग्राम बना। उस समय दिल्ली में अप्पू घर हुआ करता था और उसमें बहुत भीड़ हुआ करती थी ,अब तो अप्पूघर हट गया है।
सब बच्चे अप्पूघर देखने गये । भीड़ - भाड. तो बहुत थी। सबने एक दूसरे का हाथ पकड़ रखा था। पता नहीं कैसे तो अनीशा का हाथ छूट गया जब वे मैरी हो राउण्ड का झूला देख रहे थे। यह नये तरह का बना हुआ था । इसमें बैठने के लिये बैंच नहीं थी। कप और प्लेट थे। कप प्लेट में घूमता था और फिर प्लेट भी घूमती थी। कप प्लेट दोनों मिलकर घूम रहे थे चरखी पर।अनीशा बड़े ध्यान से यह देखने में लगी हुई थी। उसे पता भी नहीं चला कब उसका हाथ छूट गया। और लोग आगे बढ़ गये।
जब अनीशा का ध्यान टूटा तो उसने पाया कि वह अकेली खड़ी है। उसके साथ के लोग आगे बढ़ चुके थे। वे किधर गये थे, उसे पता नहीं था। इतनी भीड़ में वह अकेली थी।
उधर जो लोग आगे बढ़ गये थे उन्होंने देखा कि अनीशा उनके साथ नहीं है। कहॉं रह गई अनीशा ? इतने बड़े अप्पूघर में उसे कहॉं ढूँढें ?मौसी को चिन्ता हुई। क्या कहेगी अनीशा की मम्मी से कि अनीशा कहॉं गई। बड़ी ज़िम्मेदारी थी। लेकिन अब तो लापरवाही हो गई थी। इतनी बड़ी भीड़ में कहॉं ढूँढें बच्ची को ?
फिर ध्यान में आया कि जिस रास्ते से आये हैं, उसी रास्ते से लौटते हैं, तो शायद दिखाई दे जाये। जब लौटे तो वहीं कप प्लेट वाले मैरी गो राउण्ड के पास अनीशा खड़ी थी। सबकी जान में जान आई।
हुआ यह था कि अनीशा को जब पता चला कि वह अकेली रह गई तो वह चुपचाप वहीं खड़ी रह गई। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि किधर जाये। सब उसके लिये नया था। उसने बुद्धिमत्ता से काम लिया, न रोई, न घबराई। धीरज से प्रतीक्षा करती रही।
वहीं एक पति - पत्नी का युगल भी आ रहा था। उन्होंने बच्ची को अकेले खड़ा देखा,तो समझ गये कि वह खोई गई है। वे उसके पास आकर खड़े हो गये, और उससे पूछा-“ उसके साथ के लोग कहॉं हैं ।” बच्ची क्या बताती। वे समझ गये कि बच्ची छूट गई। उन्होंने भी सहायता करने की सोची। पर बच्ची ने कहा कि वह वहीं खड़ी- खड़ी प्रतीक्षा करेगी।
मौसी लपककर अनीशा के पास पहुँची, उसका हाथ पकड़ा, और सबको भी डॉंटा कि कैसे उन्हें पता नहीं चला कि अनीशा का हाथ छूट गया।
बड़ी वारदात होते होते टली। भगवान् को तो धन्यवाद दिया ही, साथ ही नन्हीं अनीशा का धैर्य भी था। इधर- उधर चली जाती तो ढूँढना मुश्किल था।
