Durga Thakre

Children Stories Drama Inspirational


4.5  

Durga Thakre

Children Stories Drama Inspirational


गुनाहगार कौन  ?

गुनाहगार कौन  ?

15 mins 35 15 mins 35

(पर्दा उठता है। खेत का हरा-भरा दृश्य)

गौरी और चंदन को प्रकाश ने अपने खेत मे घास खाने के लिए खुला छोड़ दिया था। गौरी गाय हरे घास के खेत में घास खा रही थी। उसके साथ मे उसका दो माह का बछड़ा चंदन भी था। वह चंदन को खेत और आसपास की जगहों से परिचित करवा रही थीं। चंदन कभी अपनी अम्माँ के आगे हो जाता,तो कभी खेलने लग जाता। चंदन बड़ा ही नटखट था। उसे खेलना कूदना अच्छा लगता था।

चंदन -अम्माँ मुझे घास नहीं खाना।

गौरी - अरे चंदन ! ये मोटी-मोटी घास नहीं ये मुलायम हरी- हरी घास खा।

चंदन -अम्माँ मुझे घास पसन्द नहीं है। मुझे खेलना हैं।

गौरी -चंदन ...मेरे लाड़ले बेटे ,देखो ये मुलायम घास कितनी अच्छी हैं।एक बार चख कर तो देख। आह! कितनी स्वादिष्ट है। आओ देखो,देखो।

(चंदन कुछ तिनके मुँह में लेता हैं।)

चंदन- थू...थू.... ओह ओह ! अम्माँ मुझे अच्छी नहीं लगती घास -बास।

गौरी - चंदन, हरी -हरी घास हमारे शरीर के लिए बहुत ही पौष्टिक होती हैं। इससे तुम्हें ताकत मिलेगी। और तुम फुर्तीले,बुद्धिमान भी बनोगे।

चंदन - पर अम्मां, आज मेरा घास खाने का मन नहीं है।

गौरी- ओ चंदन,तुम्हें कैसे समझाऊ कि तुम जैसे बढ़ते बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए ये हरी-हरी मुलायम घास खाना बहुत जरूरी हैं।

चंदन-अम्माँ।

( चंदन, गौरी की बात नहीं मानता। वह खेलने कूदने लगता हैं।अचानक उसकी नजर खेत से लगी सड़क के पार लगी मिठाइयों की दुकानों पर पड़ती हैं।वह देखता हैं कि दुकानों पर भीड़ लगी हैं। )

चंदन- अम्माँ,देखो उस ओर कितनी भीड़ लगी हैं। क्यों न हम भी वहाँ चले।

गौरी-चंदन, वहाँ पर बहुत लोग हैं।वे हमें वहाँ देखेंगे तो मार कर भाग देंगे। हमें अपने खेत में ही रहना चाहिए। मालिक हमको यहाँ न देखेंगे तो चिंता में पड़ जायेंगे।

( चंदन गौरी की बात न मानकर नजर चुराकर खेत से निकलकर सड़क पर आ जाता हैं। सड़क पर आते ही उसे बहुत अच्छी गर्मागर्म मिठाइयों की सुगन्ध आने लगती हैं। गौरी उसको ढूंढते हुए सड़क पर आ जाती हैं। )

गौरी - अरे चंदन, यहाँ क्या कर रहा है?

चंदन - देखो न अम्माँ, कितनी अच्छी सुगन्ध आ रही हैं। ऐसा लगता हैं मालिक के घर जैसी जलेबियाँ बन रही हो।

गौरी - अरे,देखो वहाँ कितनी भीड़ हैं। हमें वहाँ कोई देखेगा तो मार देगा।

चंदन -नही अम्माँ, मैं तो जलेबी ही खाऊंगा।

गौरी - नहीं चंदन,वहाँ खतरा हैं।चलो वापस खेत में चलते हैं।

(चंदन मन मारकर गौरी के साथ वापस खेत में आ जाता हैं।लेकिन उसने मन ही मन सोच लिया था कि वह आज जलेबी खाकर रहेंगा। जैसे ही गौरी घास खाने में व्यस्त हुई,वह फिर से नजर बचाकर दौड़ लगाता हुआ,सड़क पार कर दुकानों के नजदीक पहुंच जाता हैं। कुछ देर वह इधर -उधर देखता हैं। ताजी और गरमागरम जलेबियाँ की सुगंध से उसके मुँह में पानी आ जाता है। वह बार -बार अपनी जीभ निकाल कर नाक पर फिराता हैं। दुकानदार ग्राहकों को जलेबियाँ तोल पॉलीथीन में दे रहे थे। और ग्राहक बड़े मजे से पॉलीथीन में रखकर खा रहें थें। वे पॉलीथीन को ऐसे ही खुली जगह में फेंक दिया करते। दुकानों के आस पास ऐसी ही जलेबियों के रस से लथपथ बहुत सी पॉलिथीन बिखरी हुई थीं। तब ही एक ग्राहक ने जलेबियाँ लेकर खाई और रस भरी पॉलीथीन चंदन के सामने फेंक दी। चंदन पॉलीथिन को चाटने लगा।उसे रस बड़ा मीठा -मीठा लगा।वह आस पास की और पन्नियों को बिन कर मुँह में लेकर चबाने लगा। उसने बहुत सारी पालिथिनों को चबा कर निगल गया। वहाँ उपस्थित किसी भी व्यक्ति ने उस छोटे बछड़े को पॉलीथीन निगलते नहीं रोका। अचानक गौरी ढूंढते हुए वहाँ आ जाती हैं।)

गौरी - अरे चंदन ! ये कोई खाने की चीज नहीं हैं,चलो जल्दी यहाँ से,मालिक आते ही होंगे हमें घर ले जाने को।

चंदन -अम्माँ जलेबियाँ कितनी स्वादिष्ट होती होंगी ना।

गौरी -हाँ चंदन, पर हमें तो घास ही खाना चाहिए, तुम्हारे लिए मैंने बहुत मीठी -मीठी मुलायम घास देखी हैं।चलो अब।

चंदन -मीठी -मीठी घास अम्माँ।

गौरी - हाँ, तुमको बहुत अच्छी लगेगी।

( गौरी और चंदन ऐसे ही बातें करते हुए,अपने मालिक प्रकाश के खेत में आ गए। )

गौरी -देखो, ये कितनी मुलायम हैं खाकर कर देखो।

(चंदन घास को चबाने की कोशिश करने लगता हैं। शाम होने को थीं,तो प्रकाश खेत पर आकर दोनों को घर ले आता हैं। वह गौरी को छप्पर में बांध देता हैं,पास ही की रस्सी में चन्दन को भी बांध दिया। मीनू और दीपू उसके पास आ जाते हैं। )

दीपू - मीनू, आज तुम्हारे लिए मैं अपने घर से देखो क्या लाया हूँ?

मीनू -दिखाओ,दिखाओ ...अरे वाह ! दीपू ...मीठा हलवा।

दीपू-हाँ, आज मेरी माँ ने मेरे लिए बनाया था ।

मीनू -दीपू, चलो हम चंदन को भी खिलाएंगे।उसको मीठा खाना बहुत पसंद हैं।

दीपू -हाँ।

मीनू - चंदन ....चंदन . .लो ...लो मीठा हलवा खाओ ....खाओ।

दीपू - उसके मुँह के पास ले कर जाओ मीनू।

( चंदन अपना मुँह इधर -उधर घूमता है।मानो हलवा खाने से मना कर रहा हो।)

दीपू - मीनू, ये क्यों नही खा रहा है ?

मीनू - अरे दीपू, आज ये गौरी के साथ खेत में गया था, शायद ये बहुत थक गया होगा।

दीपू - अच्छा, तो अब क्या करें।

मीनू - हम इसे सुबह खिलाएंगे।

दीपू -हाँ,ठीक है। तुम हलवा की कटोरी अभी अपने घर ही रख लो।

मीनू - हाँ,ठीक है।

(दोनों बच्चे अपने घर चले जाते हैं।)

प्रकाश - अरे मीनू !ये क्या है तुम्हारे हाथ में?

मीनू- बाबा, दीपू आज चंदन के लिए मीठा हलवा लेकर आया था,लेकिन चंदन ने खाया ही नही।

देवकी -अरे बेटी, उसने दूध पी लिया है और आज खेत में भी गया था तो हरी घास भी खाई होगी।जा,इसे रसोईघर में ढककर रख दे। सुबह खिला देना।

मीनू- हाँ, माँ।

(सुबह होने पर, प्रकाश गौरी का दूध दोह कर चंदन को दूध पीने के लिए छोड़ देता है।पर चंदन दूध नहीं पीता।वह अनमना सा खड़ा रहता है।)

मीनू -बाबा, क्या मैं चंदन को हलवा खिला दूँ?

प्रकाश - हाँ खिला दे मीनू, अभी उसने दूध भी नही पीया।

मीनू -चंदन .....चंदन ..देखो मीठा हलवा ..तुझे बहुत पसंद हैं ना।ले खा.....खा रे।

मीनू -बाबा ये तो, हलवा खा ही नहीं रहा हैं।

प्रकाश - बाद में खिला देना मीनू। मैं खेत पर जा रहा हूँ।

(दीपू का आगमन)

दीपू - मीनू ...मीनू, चलो पढ़ाई करते हैं, मुझे ये सवाल समझ नही आ रहा है, तू बता दे।

मीनू - दीपू, अभी बाद में बताऊँगी। पहले मैं चंदन को हलवा खिला दूँ।

दीपू - इसने अभी तक नही खाया क्या ?मैं तो दो -दो कटोरी खा गया।

(देवकी का आगमन)

मीनू - देखो न माँ, चंदन मेरे हाथ से हलवा नही खा रहा हैं और बाबा ने बताया कि इसने अभी दूध भी नही पीया।

देवकी - अच्छा, जरा गौरी के पास छोड़ दे, अब पी लेगा।

मीनू - दीपू तू इसकी रस्सी खोलने में मेरी मदद कर दे।

दीपू - हाँ, तू हट मैं अभी खोल देता हूँ।

मीनू - जा चंदन,जा दूध पी ले।

(बछड़ा अपनी माँ के पास जाकर खड़ा हो जाता हैं। गौरी उसे दुलारती हैं।लेकिन वह दूध नही पिता।)

दीपू - मीनू ये तो अभी भी दूध नही पी रहा है।

मीनू - हाँ,दीपू।

देवकी - अरे ! तुम दोनों क्यों परेशान हो रहे हो पी लेगा।चलो दूर हो जाओ वहाँ से और जाकर अपनी पढ़ाई करो। मैं गौरी को घास डाल कर आती हूँ।

मीनू -ठीक हैं माँ।

(इसी तरह चंदन बिना कुछ खाये पीए सारा दिन भी निकाल देता हैं, गौरी उसे दुलारती और सहलाती हैं।बार -बार दूध पीने के लिए कहती हैं लेकिन चंदन कुछ नहीं खाता पीता हैं।

संध्या का समय हो गया था,गौरी चंदन की चिंता में डूबी थी। रह -रह कर चंदन दर्द से कराह उठता। गौरी विचलित हो जाती,पर मूक जानवर क्या कर सकता था।उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।)

गौरी - चंदन,अब उठना देख सांझ होने को आई। तूने कल से कुछ नही खाया- पीया हैं।थोड़ा सा दूध ही पीले। उठ ना चंदन।

चंदन - अम्माँ, पेट में बहुत दर्द हो रहा हैं।

गौरी - थोड़ा सा दूध पी ले। सब ठीक हो जाएगा।

चंदन -अम्माँ, बहुत तेज दर्द हो रहा है।मुझे कुछ नहीं खाना-पीना।

गौरी - सब ठीक हो जाएगा चंदन, सब ठीक हो जाएगा।(चंदन को दुलार करते हुए।)

(इसी तरह चंदन सारी रात दर्द से कराहता रहा। गौरी उसको सहलाती रही।)

(सुबह का समय प्रकाश दूध दोहन आता हैं। लेकिन गौरी आज दूध नहीं देती वह बार -बार पैर पटकती और प्रकाश को दूर करने की कोशिश करती।)

प्रकाश -अरे क्या हो गया आज तुझे।क्यों ऐसा कर रही हैं। मीनू ..ओ मीनू जरा इधर आना।

मीनू -जी बाबा, क्या हो गया।

प्रकाश -जा,आंगन में से थोड़ी घास ले आ।

मीनू - ठीक है।(आंगन से घास लेकर आती हैं। )

प्रकाश - गौरी के सामने डाल दे। और थोड़ा सा चंदन के सामने भी डाल दे।

मीनू - बाबा, चंदन ने तो कल से दूध ही नही पीया। दीपू और मैंने हलवा भी दिया तो इसने नही खाया।

प्रकाश - आज भी ये दूध नहीं पी रहा,शायद इसलिए गौरी दूध नही दोहने दे रही हैं।

मीनू -बाबा,चंदन को क्या हो गया हैं ?

प्रकाश - पता नही,बेटा। जा तेरी माँ से कहना चंदन के लिए काढ़ा बना दे। काढ़ा पिला कर देखते हैं।

मीनू - ठीक है, बाबा।(मीनू जाती हैं )

माँ ...माँ,बाबा ने कहा हैं कि चंदन के लिए काढ़ा बना दो। चंदन दूध नही पी रहा हैं।

देवकी - क्या, कल शाम को भी उसने दूध नहीं पीया था। अभी बनाती हूँ।

(देवकी जड़ी -बूटी डालकर काढ़ा बनाकर आंगन में ले आती हैं।)

देवकी -मीनू,जा बाबा से कहना चंदन को यही ले आयें,तब तक काढ़ा थोड़ा ठंडा भी हो जाएगा।

मीनू - ठीक है माँ।

(एक और से दीपू और दूसरी और से प्रकाश,मीनू,चंदन का आगमन)

प्रकाश - बन गया क्या काढा।

देवकी - हाँ,जी ये लीजिये गिलास से पिला दीजिए।

दीपू -मीनू, चंदन को क्या हो गया।

मीनू -पता नहीं, परसों से चंदन ने दूध ही नहीं पीया।

दीपू -अच्छा।अभी इसको क्या पिला रहें हैं काका।

मीनू - माँ ने जड़ी -बूटी से काढ़ा बनाया हैं, वही पिला रहें हैं।

प्रकाश - देखो मीनू की माँ,अगर दोपहर तक ये दूध पीने लग जाता हैं तो अच्छी बात हैं।

देवकी - हाँ,जी।

मीनू - बाबा, अब चंदन अच्छा हो जाएगा ना।

प्रकाश - हाँ, बेटे।

दीपू - जब ये अच्छा हो जाएगा,तो हम इसके साथ खूब खेलेंगे।

देवकी - हाँ,दीपू,मीनू खेलना पर अभी इसे आराम करने दो।

प्रकाश - इसको गौरी के पास ही छोड़ देते हैं। वहाँ ठीक रहेगा।

(चंदन को गौरी के पास छोड़ देते हैं। गौरी उसको देख कर रंभाने लगती हैं। उसको सहलाती हैं। इस तरह दोपहर ...और दोपहर से शाम को हो गई,लेकिन चंदन की हालत में कोई सुधार न हुआ।मीनू उसको देखने जाती हैं। )

मीनू - चंदन, देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाई हूँ, छाछ का पानी ।लो पीलो।(कटोरे को चंदन के मुँह के पास ले जाती हैं। चंदन थोड़ी देर उसे सूंघता हैं और फिर मुँह हटा कर अम्माँ..... अम्माँ ...चिल्लाने लगता हैं। उसकी दर्द भरी आवाज सुनकर गौरी भी रंभाने लगती हैं।यह देख मीनू मायूस हो जाती हैं।वापस घर में चली जाती हैं।)

मीनू- माँ ....चंदन ने छाछ का पानी भी नहीं पीया।उसे क्या हो गया हैं ? वो क्यों पहले की तरह कुछ खा -पी नहीं रहा है? गौरी भी कितना चिल्ला रही हैं।( मीनू रुआंसे स्वर में देवकी से कहती हैं।)

देवकी - ठीक हो जाएगा मीनू,तू फ्रिक न कर। वह पहले जैसा ही हो जाएगा। तू रो मत।

मीनू - वो तीन दिन से खेल भी रहा हैं।पहले कितना दीपू और मेरे साथ खेलता था।

देवकी - अरे ! मीनू,उसे कुछ नहीं होगा। तेरे बाबा से कहूंगी, कि कल उसको डॉक्टर के पास ले जाएं। ठीक है, तू रो मत।चुप हो जा।

मीनू - मैं अभी बाबा से बोलती हूँ,उसे डॉक्टर के पास ले जाएं।

देवकी - मीनू, अभी देखो रात होने वाली हैं।डॉक्टर का दवाखाना भी बंद हो गया होगा।

(प्रकाश का प्रवेश)

मीनू - बाबा,बाबा हम चंदन को डॉक्टर के पास ले जाएं।

प्रकाश - सुबह ले जाएंगे मीनू। तुम क्यों रो रहीं हो।

मीनू -बाबा,चंदन........!

प्रकाश - कुछ नहीं होगा उसको।

देवकी -यहीं तो मैं कब से समझा रही हूँ।पर यह रोये जा रही हैं।

प्रकाश - चुप हो जाओ बेटा।हम सुबह ही उसको डॉक्टर के पास ले जाएंगे।

(उधर छप्पर में चंदन कमजोरी के कारण खड़ा भी नहीं हो पा रहा हैं। गौरी उसको जीभ से चाटती,खूब दुलार करती।चंदन कराह उठता और अम्माँ...... अम्माँ..... अम्माँ बोलता। सुबह तक चंदन और गौरी इसी तरह करते रहे।)

मीनू - क्या हम चंदन को डॉक्टर के पास लेकर चले ?

देवकी - अकेले कैसे ले जाओगे, वह तो खड़ा भी नहीं हो पा रहा हैं।

प्रकाश - हाँ, सही कहा। मीनू तू जा कर रमाशंकर काका को बुला ला। हम दोनों उसे गाड़ी से डॉक्टर के पास ले जाएंगे।

देवकी - हाँ, सही रहेगा।

(मीनू जाती हैं,और दीपू के पिताजी रमाशंकर को बुला लाती हैं। मीनू के पीछे -पीछे रमाशंकर का प्रवेश)

रमाशंकर - अरे ! भैया क्या हो गया ?

प्रकाश - अरे !भैया दो तीन दिन बछड़ा न तो दूध पी रहा हैं न ही कुछ और खा रहा हैं।

देवकी - कल से दो बार काढ़ा भी पिला कर देख लिया,पर कोई सुधार न हुआ भाई जी।

रमाशंकर - अच्छा।

प्रकाश - सोचा डॉक्टर को दिखा दे।पर मैं अकेला कैसे ले जाऊं,इसलिये तुमको बुलाया।

रमाशंकर - अच्छा,अच्छा भैया ! मैं चलता हूँ साथ में।

प्रकाश- हाँ, गाड़ी से ले चलते हैं।

(प्रकाश रमाशंकर की मदद से चंदन को मवेशियों के डॉक्टर के पास लेकर पहुँचता है।)

प्रकाश - नमस्ते,डॉक्टर साहब।

डॉ राजेश - नमस्ते,कहिये 1

प्रकाश - डॉक्टर साहब ,बछड़ा तीन से दूध नही पी रहा हैं।

डॉ राजेश -  अच्छा, चेक करता हूँ।

(डॉ राजेश बछड़े की जाँच करता है।)

डॉ राजेश - अभी मैं इसको दो इंजेक्शन लगा देता हूँ,और कुछ दवाई लिख देता हूँ। दिन में दो से तीन बार आप ये दवाइयां खिलाना।साथ मे दूध भी पिलाने की कोशिश करना। ज्यादा से ज्यादा इसे आराम करने देना। छोटा है इसलिए इतने दिनों से कुछ न खाने से बहुत कमजोर हो गया हैं।

प्रकाश - जी,डॉ साहब।

(डॉक्टर से इलाज करा कर और दवाइयां लेकर दोनों बछड़े को घर ले लाते हैं।मीनू दौड़कर आती हैं।)

मीनू - बाबा,डॉक्टर ने क्या कहा? क्या हुआ हमारे चंदन को ?

प्रकाश - कुछ नहीं हुआ मीनू।

देवकी - अरे! आ गए आप लोग।क्या कहा डॉक्टर साहब ने।

प्रकाश - दो इंजेक्शन लगाए हैं।ये गोली दवाई दी हैं।

रमाशंकर -अच्छा भैया भाभीजी, आप खिलाओ इसे दवाइयां और कोई आवश्यकता हो तो मुझे बुला लेना।

प्रकाश - अरे,बहुत बहुत धन्यवाद भैया। देवकी जाओ थोड़ा नाश्ता पानी ले आओ। और साथ मे थोड़ा गर्म पानी भी, चंदन को दवाई देना है।

देवकी -अभी लाई जी। आप बैठिए न भाई जी।

रमाशंकर - अरे तकल्लुफ न करें भाभी जी।

देवकी - नहीं,नहीं भाई जी, कोई तकल्लुफ नहीं हैं। मैं अभी आई।

प्रकाश - पता नही भैया,क्या बीमारी हैं।

रमाशंकर- हाँ भैया,अब बेजुबान जानवरों की बीमारियां तो अच्छे अच्छे डॉक्टर नहीं पकड़ पाते। देखो दवाइयां खिलाकर।

(प्रकाश और देवकी चंदन को डॉक्टर के कहे अनुसार दवाइयां देते हैं, लेकिन चंदन की हालत में कोई सुधार नजर नहीं आता उधर गौरी अपने बच्चे की ऐसी हालत देख आंसू बहा रही हैं। )

गौरी - चंदन ....क्या हो गया तुझे। आंखे खोल मेरे लाल। थोड़ा सा दूध पी ले। तूने चार दिनों से कुछ नहीं खाया। तू बोलता क्यों नहीं।

(गौरी चंदन को दुलारती,सहलाती है।चंदन कमजोरी के कारण कुछ नहीं बोल पा रहा हैं  । उसकी हालत पहले से ज्यादा खराब हो रहीं हैं। सारी रात चंदन कराहता रहा और गौरी उसे दुलारती,पुचकारती रही।

अगली सुबह जब प्रकाश और देवकी ने चंदन की नाजुक हालत देखी तो उसे डॉक्टर के पास ले जाने का निर्णय लिया। )

देवकी - देखिए जी, इसकी हालत तो बहुत खराब लग रही हैं।

प्रकाश - हाँ,मीनू की माँ।

देवकी - इसे तुरंत डॉक्टर के पास ले जाइए।

प्रकाश - तुम ठीक कह रही हो, मैं अभी रमाशंकर भैया को बुला लाता हूँ।

(प्रकाश दोबारा रमाशंकर की सहायता से चंदन को डॉ राजेश के पास लाते हैं।)

प्रकाश - डॉ साहब, आपने जो दवाइयां दी थीं,हमने बराबर बछड़े को खिलाई।पर इसकी हालत में कोई सुधार न हुआ।

डॉ राजेश - अच्छा,देखता हूँ।

रमाशंकर - डॉ साहब, कल से तो इसकी तबीयत और भी खराब होतीं जा रहीं हैं।

डॉ राजेश - हाँ, देख रहा हूँ।

(डॉ राजेश के जाँच करने से पहले ही चंदन तड़पने लगता हैं। )

प्रकाश - अरे ! रमाशंकर भैया ये कैसा कर रहा हैं ? 

रमाशंकर - अरे....!डॉक्टर साहब देखिए न इसे।

( डॉ राजेश बछड़े की ओर जाँच करने बढ़ता ही हैं कि चंदन तड़प तड़प कर दम तोड़ देता हैं।)

डॉ राजेश - आई एम सॉरी। इसने तो दम तोड़ दिया।

रमाशंकर - अरे ....राम...राम ..!!

प्रकाश - हे भगवान ! क्या कर दिया।

रमाशंकर - डॉ साहब इसे क्या बीमारी हुई थीं?

प्रकाश - हाँ, डॉ साहब ये तो बताइए।

डॉ राजेश - ये तो मैं इसका पोस्टमार्टम करके ही बता सकता हूँ।

प्रकाश - जी डॉ साहब, आप कीजिये पोस्टमार्टम।पता तो चले इतना छोटे से बछड़े को आखिर हुआ क्या था?

रमाशंकर - हाँ,डॉ साहब।

डॉ राजेश - आप इंतजार करिये, मैं पोस्टमार्टम करके जल्दी ही आप लोगों से मिलता हूँ। पवन (कम्पाउंडर) इसे पोस्टमार्टम कक्ष में ले चलो।

( डॉ राजेश लगभग एक घण्टे में बछड़े का पोस्टमार्टम करके प्रकाश और रमाशंकर के पास आते हैं )

प्रकाश - क्या बीमारी थीं डॉ साहब ?(उत्सुकता से )

डॉ राजेश - देखिए इस बछड़े को कोई बीमारी नही थीं बल्कि इसके पेट में से लगभग आधा किलो प्लास्टिक निकली हैं जिसकी वजह से ही इसकी मौत हुई हैं।

प्रकाश - प्लास्टिक ?

डॉ राजेश - हाँ, प्लास्टिक।

जीवों के लिए प्लास्टिक को पचा पाना असंभव है।आँतो में जाने वाले प्लास्टिक के रिएक्शन काफी खराब होते हैं।कई बार नुकीला प्लास्टिक गले के नीचे नहीं उतरता है, ऐसे में उनका दम घुटने लगता है।प्लास्टिक में मौजूद केमिकल्स की वजह से उन्हें इंफेक्शन हो जाता है, जिसके कारण कुछ समय बाद ही इनकी मौत हो जाती हैं।

प्रकाश - ओह, प्लास्टिक ही इसकी मौत की जिम्मेदार हैं। ठीक हैं डॉ साहब। इस छोटे से बछड़े को पॉलिथीन खाने से किसी नहीं रोका।

(प्रकाश और रमाशंकर बछड़े के शव को लेकर घर आ जाते हैं 1)

देवकी - क्या हुआ जी हमारे चंदन को ?

प्रकाश - चंदन अब नहीं रहा।

देवकी - हे भगवान।

मीनू - बाबा, हमारा चंदन अब मेरे साथ नहीं खेलेगा क्या ?

रमाशंकर- हाँ, मीनू बिटिया। चंदन मर गया हैं।

देवकी - दो महीने का ही तो था। क्या हो गया, कुछ समझ ही नहीं आया।

प्रकाश- हाँ, मीनू की माँ।

देवकी - क्या बीमारी निकली इसे,कुछ बताया डॉक्टर ने।

प्रकाश - डॉक्टर ने पोस्टमार्टम किया था।

रमाशंकर- लगभग आधा किलो प्लास्टिक निकली इसके पेट में।इसी कारण मौत हुई। डॉक्टर ने बताया।

देवकी - प्लास्टिक ..!

मीनू - प्लास्टिक काका ..!

प्रकाश - हां मीनू, हमारे चंदन की मौत का कारण ये जहरीली प्लास्टिक ही हैं।

(मीनू आंगन में बैठी चंदन को याद कर रही हैं। छप्पर में बंधी गौरी अपने बेटे चंदन का इंतजार करते हुए रंभा रहीं हैं। )

पर्दा गिरता है।


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