चुटक विनायक
चुटक विनायक
एक प्राचीन लोक कथा है जो किसी त्यौहार व व्रत आदि पर मुख्य कथा सुनाने के बाद दूसरी सहायक कथा के रूप में सुनाई जाती है।वर्णन अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकता है पर मुख्य बात यह हृदयगंम कराना है कि अच्छे दयालुता पूर्ण कामों का फल अच्छा होता है । कथा इस प्रकार है—
एक समय की बात है कि गणेशजी छोटे बच्चे का रूप बनाकर एक चुटकी में चावल व एक चम्मच में दूध लेकर गए कि कोई उनके लिए इनकी चावल की खीर बना दे। जहाँ जहाँ गए सभी ने मना कर दिया कि इसकी क्या खीर बनेगी।
पर एक निर्धन बुढ़िया को बच्चे पर वात्सल्य एवं करुणा आ गई। उसने कहा-" आओ मैं तुम्हारे लिये खीर बना दूँ। "
उसने गणेश जी से वे एक चुटकी चावल ले लिये और एक चम्मच दूध ले लिया ।बच्चे को ख़ुश करने के लिये एक पतीली में दूध डाला। पर जब वह उसमें चावल डालने लगी तो वे बढ़ गए और दूध भी बढ़ गया। सारा बर्तन भर गया। उसे बड़े बर्तन में दूध डालना पड़ा ,वह भी भर गया । फिर तो उसने ख़ूब सारी खीर बनायी।
जब खीर बन गई उसने गणेश जी से कहा ,"आप भोग लगाओ। "
गणेश जी ने कहा -"मैंने तो स्वीकार कर लिया ,
मेरा भोग लग गया ,अब उसको सबको बॉंट दो।"
बुढ़िया ने सारे मोहल्ले में खीर बॉंटी,सब लोगों को खीर मिली। खीर का अमृत जैसा स्वाद था।
लोगों ने कहा-आज इसने सबको खीर बॉंट दी ,रोज तो माँगती रहती थी, आख़िर आज कहाँ से इतना दूध और चावल ले आयी ?
जब सब बात पता चली तो उन्हें बुढ़िया के भाग्य से ईर्ष्या हुई। उसकी सराहना करने लगे।
इतना बाँटने के बाद भी खीर बच गई। बुढ़िया ने
गणेश जी से कहा -'इतनी खीर बच गई ,इस बची हुई खीर का क्या करूँ?'
गणेश जी ने कहा-'तुम इसे ढक कर रख दो'। इतना कहकर गणेश जी चले गये।'
बुढ़िया ने खीर ढक कर रख दी और रात होने पर सोने चली गई।
दूसरे दिन बुढ़िया जब सोकर उठी तो उसने देखा उसका सारा घर सब अच्छे अच्छे सामानों से भर गया था, और खीर के कटोरे में बहुमूल्य माणिक्य हीरे मोती और स्वर्ण भरा हुआ था। बुढ़िया की दरिद्रता दूर हो गई और वह सुख चैन से रहने लगी, वैभव शालिनी हो गई। उसने गणेश जी की कृपा के लिये बहुत आभार माना और उन्हें बहुत बहुत धन्यवाद दिया। बुढ़िया उस धन से सब ज़रूरतमन्दों की सहायता करने लगी।
जैसा गणेश जी ने उस बुढ़िया का घर भरा, सबका घर भरें, सब पर कृपा करें। सब लोग सुख शान्ति से रहें।
सही कहा गया है- कर भला हो भला। जो दूसरों की सहायता करता है, भगवान् उसकी सहायता करते हैं।
