बाऊ जी ने कहा था- भाग ६
बाऊ जी ने कहा था- भाग ६
दो एक दिन इसी तरह उन्हें ह्वीलचेयर पर बैठाकर घुमाया। लॉन में भी चक्कर लगाये, सब देख भाल लिया। पर उसके बाद थकान के कारण नहीं गईं। हमें भी लगा कि शुरू- शुरू में उत्साह के कारण घूम ली, लेकिन कमजोरी काफ़ी है। काफ़ी हिम्मत वे करती थीं, पर अपने से उठा नहीं जाता था, सहारा लेना पड़ता था। फिर भी उनमें आत्मविश्वास बहुत था ।उनका कहना था कि ईश्वर है या नहीं, नहीं कह सकते, पर अपने में विश्वास अवश्य होना चाहिये ।
बिस्तरे पर लेटे लेटे पैरों में कमजोरी आ गई थी ठीक से खड़ी भी नहीं हो पाती थीं। तो कमरे में ही कुर्सी पर बैठा देते थे इससे वे सन्तुष्ट रहती थी। स्वयं भी खिसककर कुर्सी पर बैठ जाती थीं, इस तरह काम चल जाता था।
पर उनके कम सुनने की वजह से बातचीत में परेशानी होती थी। हमने कहा-“ आप कान की सुनने वाली मशीन ले लीजिये, इससे बातचीत करने में सुविधा होगी।”
उनके सहमति देने पर एक को घर पर बुलाकर हियरिंग टेस्ट भी कराया, वह ट्रायल के लिये मशीन भी दे गया, पर वह उन्हें सूट नहीं करी। आख़िरकार मशीन लौटा देनी पड़ी। उसमें उन्हें खड़खड़ या घूँ घूँ की आवाज़ आती थी। हमने कहा अभी शुरू शुरू में लगेगा ,आदत पड़ने पर ठीक हो जायेगा। पर उन्होंने कहा-“ कान में सरसों के तेल की बूँद मल लूँगी, उसी से ठीक हो जायेगा। अभी तक अकेली थी तो काम चल रहा था, बातचीत होती नहीं थी,ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी। अब धीरे -धीरे ठीक हो जायेगा”।
उनसे बचपन की बातें होती रहती थीं ।उन्होंने एक दिन कहा-“ तुम्हें बड़े बाबा जी की याद है ?” फिर अपने से बोलीं, “ तुम्हें कैसे याद होगी, तब तो तुम हुई भी नहीं थी। मैं ही तब छह महीने की थी, जब उनका देहावसान हो गया”।
फिर पूछा-“ तुम्हें छोटे बाबा जी की याद है” ?
मुझे उनकी भी याद नहीं थी। पर मेरे से बड़ी और उनसे छोटी जो बहिन थीं वे बताया करती थीं कि तब मैं डेढ़- दो साल की थी और उनके पेट पर कूदा करती थी।
मैंने कहा-“ मुझे छोटे बाबा जी की तो ठीक से याद नहीं है पर एक धुंधला सा चित्र है कि उनके कमरे के आस- पास की पलहैंडी में सफ़ेद फूलों का लम्बा सा गुलदस्ता लाल रंग के फूलदान में रखा रहता था और भीगे सफ़ेद बारीक कपड़े में लिपटा हुआ ख़ुशबूदार हल्के हरे रंग का कुछ बडा़ सा थोड़ा लम्बा सा फूल रखा रहता था। बाद में पता चला था कि सफ़ेद फूल केतकी के थे और भीगे कपड़े में लिपटा हुआ केवड़ा था।”
जीजी ने कहा-“तुम्हें खूब याद रहा । छोटे बाबा जी को केतकी के फूल और केवड़ा बहुत पसन्द थे , बाग से माली दे जाता था ।”
हमारा बाग बहुत बड़ा था, सब तरह के पेड़ वहॉं थे ,फलों के वृक्ष थे, सब तरह के फूल थे , साग सब्ज़ी थी।बचपन में बाऊ जी के साथ रोज सुबह या शाम पेशावरी तॉंगे में बैठकर बाग में घूमने और देखभाल करने ज़ाया करते थे ।माली रोज़ ही फूलों का गुलदस्ता, पूजा के लिये ताजे फूल , और खेत की सब्ज़ी सुबह ही सुबह बड़ी सी टोकरी में घर में दे ज़ाया करता था ।फलों के मौसम में बाग से ही फल आ जाते थे। हमारे बाग की लीची और लौकाट व चकई आड़ू बहुत अच्छे होते थे, और सबको पसन्द आते थे।मौसम में आम भी खूब अच्छे और मीठे आते थे।हमारे बाबा जी दो भाई थे। बड़े बाबा जी के दो बेटे थे, पर छोटे भाई निस्सन्तान थे। रिश्ते की चाची ने अपनी भतीजी की शादी छोटे बाबा जी से करा दी थी,पर उनके कोई सन्तान नहीं हुई थी। हम सब बच्चे बड़े बाबा जी के बड़े बेटे के थे। बड़े बाबा जी के छोटे बेटे को छोटे बाबाजी ने बाद में गोद ले लिया था। सब परिवार प्रेम भाव से साथ ही रहता था , किसी को पता नहीं चलता था कि कौन किसका है।
जीजी पिछली यादों में खोई हुई थीं। उन्होंने बताया-“ छोटे बाबा जी हुक्का पीते थे, उनके हुक्के में चॉंदी की नली ऊपर में लगी हुई थी, जिससे वे हुक्का गुड़गुड़ाते थे। उनके हुक्का पीने के बाद हम और छोटे भाई, जो बराबर के से थे, चुपके से वहॉं जाते थे और उनका हुक्का गुड़गुड़ा आते थे। फिर भाग जाते थे और ख़ुश होते थे। “
उन्होंने बताया- “ गर्मियों में शाम होने पर भिश्ती बड़े सहन में छिड़काव कर जाता था। दो पलंग इधर- उधर दोनों तरफ़ बिछ जाते थे। बीच में दोनों तरफ़ पॉंच- छह कुर्सियॉं बिछ जाती थीं। “चलो, बड़ी हवेली में चलकर बैठते हैं,”कहकर छोट बाबू, जगदीश जी आदि कुछ लोग मिलने चले आते थे। दोनों तरफ़ दो नौकर हाथ में बड़ा पंखा लेकर पंखा झलते रहते थे।हमने वे सब ठाठ देखें हैं पहले के। “
जीजी ने पिछली बातें स्मरण करते हुए बताया- “ हमने सुना है कि जब मैं पैदा हुई थी तब बड़े बाबा जी ने यह सुनकर कि ‘पैंतीस साल बाद घर में बेटी हुई है’ कहा था-“ बेटी तो आई है पर जूते बहुत तुड़वायेगी “।
बाबा जी का कहना भी एक तरह से सही था। वे दो भाई और छह बहनें थे। हमारे पड़बाबा का देहान्त भी जल्दी हो गया था। बहुत छोटी उम्र में ही बाबा जी पर सब बहिनों की शादी की ज़िम्मेदारी आ गई थी। सब बहनों की शादी और दान दहेज की बड़ी ज़िम्मेदारी उन पर छोटी उम्र में ही आ गई थी जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। वे बहुत उदार दिल थे। ग़रीब आदमी की लड़की की शादी आर्थिक सहायता कर करा देते थे, बिना अहसान जताये। गरीब बच्चों की शिक्षा के लिये चुपचाप गुप्त सहायता करते रहते थे। रोगियों की दवा के लिये सहायता करते थे। उन्हें लोग देवता की तरह मानते और पूजते थे। पूरे शहर में उनका दबदबा था। सुनते हैं कि उस जमाने में जब हिन्दू- मुस्लिम दंगे होते थे, अंग्रेजों का जमाना था, अंग्रेज कलक्टर दंगों को दबाने में उनकी सहायता मॉंगता था, बाबा जी को सब जानते थे, उनके अहसानों से दबे हुए थे। जैसे ही वे दो ,एक लोगों का नाम लेकर पुकारते कि किस बात का झगड़ा है, सब लोग चुपचाप तितर- बितर हो जाते थे ,वहॉं से लौट जाते, सब शान्त हो जाता।
ऐसे घर में इतने वर्षों बाद लक्ष्मीस्वरूपा बेटी आई तो उसे राजकुमारियों की तरह पलना ही था। और उसी तरह उनका लालन- पालन बहुत लाड़ प्यार से हुआ।
