Arvind Kumar Srivastava

Others


5.0  

Arvind Kumar Srivastava

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अन्तर

अन्तर

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‘काली’ कॉलेज के लड़के और लड़कियों द्वारा दिया गया उसका नाम किन्तु वास्तविक नाम था ’वसुन्धरा’, ‘वसुन्धरा शर्मा,’ और घर में उसे प्यार से सब वसुधा कहते थे, यही नाम उसे पसन्द भी था, किन्तु कॉलेज में उसकी पसन्द या न पसन्द भी परवाह कौन करता है। अनमनी सी काली ने अपनी जीन्स उतारी और बेड पर बेपरवाह हो कर फेंक दी, अपने कमरे जो कि हास्टल के तीसरी मंज़िल पर था के पीछे की ओर लगी खिड़की से नीचे के तरफ देखा भिक्खी, मैना, पुल्ली, और कित्ती, बैडमिन्टन खेल रही थी भिक्खी और कित्ती बैडमिन्टन कोर्ट के एक ओर तो मैना तथा पुल्ली दूसरी ओर थी। खिड़की के पास खड़ी हेा कर थोड़ी देर वह चारों का खेल देखती रही भिक्खी और पुल्ली बढ़िया खेल रही थी, जरा सी देर में ही उसे ऊब पैदा होने लगी थी, ‘छी’ उसके मुँह से धीरे से निकल गया, अजीब सा टेढ़ा मेढ़ा उसने मुँह बनाया, इन चारों को पढ़ना लिखना तो है नहीं “ उनके मन ही कहा और चढ़ कर बेड पर बैठ गयी। बिना किसी उद्देश्य के इधर उधर देखने के बाद बेड पर ही पड़े अपने बैग से अर्थशास्त्र की किताब निकाल ली।

कमरे के दरवाज़े पर हल्की सी थाप पड़ी दरवाज़ा अंदर से बन्द नहीं था खुल गया, ‘गिली’ अन्दर आ चुकी थी। काली ने गिली की ओर पलट कर देखा ‘‘अरे! तू तो गाने सुन रही है, पढ़ना नहीं है क्या? ‘‘ गिली ने काली को नहीं सुना था उसने अपने कान से मोबाइल का हेड फोन निकाला और मुँह बनाते हुए पूछा

‘‘काली तूने खाना खाया था मेस में।‘‘

‘‘हाँ और कहाँ खाती।

‘‘कितना बकवास खाना था मैं तो नहीं खा सकती।‘‘

‘‘फिर कुछ खाया था या नहीं ?‘‘

‘‘कैन्टीन से बर्गर ले आयी थी।‘‘ 

‘‘मुझे इतना बुरा नहीं लगता मेस का खाना।‘‘

‘‘काली तू तो सब एडजेस्ट कर लेती है।‘‘ 

‘‘मैं तुझे भी एडजेस्ट करती हूँ।‘‘  काली ने मन ही मन कहा और गिली की ओर और देखने लगी। गिली धीरे से अब बैठ गयी थी।

काली ने गिली को चेहरे से गहनता से परखने का प्रयास किया वह हमेशा की तरह उन्मुक्त और प्रसन्न नहीं थी पिछले तीन वर्षो से वे दोनो एक साथ थी किन्तु पहली बार गिली उसको सहज नहीं लग रही थी कुछ सोचते हुये काली ने कहा

“तू घर कब जा रही है, अपना बर्थडे मनाने तीन दिन ही तो रह गये है।“

“मैं कहीं नही जा रही हूँ।‘‘ 

“क्यूँ अभी तक तो बहुत उत्सुक थी जाने के लिये“

“किन्तु अब नहीं।"

“क्या हुआ।“ गिली को गमगीन होते देख कर काली ने अत्यंत सहजता और सरलता से पूछा।

“वे दोनो गोवा जा रहे है घूमने तो मैं वहाँ जाकर क्या करूँ।

“वे दोनो अर्थात तेरे फादर मदर।

“हाँ“

“तुझे हास्टल में छोड कर।“

“यस काली।“

 गिली की उदासी उसके चेहरे और आँखों पर झलक रही थी।

“कोई बात नहीं गिली इस बार हम तेरा बर्थडे यही हास्टल में मनायेगें धमा चैकड़ी के साथ।‘‘

गिली ने कोई उत्तर नहीं दिया चुपचुाप काली की ओर देखती रही अधीरता और विश्वास से।

काली ने अपने कमरे की खिड़की से बाहर की ओर देखा बैडमिन्टन कोर्ड की लाइटें बन्द हो चुकी थी भिक्खी और मैना हास्टल के उस विंग में थी जिसमे काली थी किन्तु पुल्ली और कित्ती भी इसी हास्टल में थी किन्तु दूसरे विंग में, थी सभी आपस में मित्र।

‘‘गिली तू बैठ, मैं भिक्खी और मैना को बुला कर लाती हूँ। फिर तेरे जन्मदिन का प्रोग्राम तय करते है बिन्दास।‘‘

‘‘कोई आवश्यकता नहीं है काली वे दोनों मुझे कमरे में न देख कर सीधे स्वयं ही यहीं आएँगी।‘‘

काली ने बेड पर बिखरे पड़े अपने सभी सामान को सहेजते हुए एक किनारे रख दिया जिससे बेड पर चारों के बैठने योग्य स्थान बन सकें।

मस्ती करते - करते सुबह के पांच बज गये थे कित्ती अर्थात ‘कविता शर्मा,‘ मिक्खी ‘भावना प्रसाद,‘मैना’ ‘मोहिनी अग्रवाल’, तथा ‘पुल्ली’ ‘आस्था कुमारी’, अपने अपने कमरों में जा चुकी थी, बाकी लड़कियाँ रात में एक बजे ही अपने - अपने कमरों में वापस लौट गयी थीं, काली गिल्ली के पास रूक गयी थी।

गिली ‘उपासना दास’ यही नाम था उसका पढ़ने में काली प्रतिभाशाली थी, बिन्दास और स्वतंत्र विचारों की भी थी किन्तु मित्र कम थे उसके कॉलेज के बाद अधिकतर समय उसका लाइब्रेरी में ही व्यतीत होता था काली से उसकी मित्रता गहन थी पिता राज्य सरकार में बड़े अधिकारी थे पैसों की कोई कमी नहीं रहती थी। घूमना मस्ती करना उसे पसन्द था किन्तु कॉलेज की पढ़ाई कभी न छोड़ती, उन्मुक्त चंचल। गिली कभी कभी उदास भी रहती थी जिसे काली ने गहनता से नोटिस किया था।

गिली मैं देख रही हूँ तुम बार बार अपने मोबाइल को देख रही है क्या कुछ खास है जिसे तुम बता नहीं सकती।

“कुछ खास नहीं काली, किन्तु छोड़ो।“

“यह नहीं हो सकता कुछ तो है जिसे तुम छिपा रही हो।“ 

“मैं अपने जुड़वाँ भाई को देख रही थी व्हाटसऐप के स्टेटस पर जो उसने रात में एक बजे अपलोड किया है।“

“कहां है वह।“

“गोवा में अपनी मम्मी डैडी के साथ।“

“तुम्हारे जुड़वाँ भाई में खास क्या है मुझे भी दिखाओ।“ काली ने गिली के हाथ से मोबाइल ले लिया था।

“ये तो क्रूज पर केक काट रहा है।“

“हाँ । गिली ने आँखों को झुका कर धीरे से कहा।

“समंदर में खड़ा यह क्रूज थ्री स्टार से कम नहीं है।“

“वे भी कहाँ कम है।“ गिली की आँखें नम हो गयी थी।

कहने सुनने को कुछ भी शेष न रहा था, उदास काली चली गयी।

किन्तु मित्रों के साथ मनाया गया यह विशेष जन्म उत्सव गिली जीवन भर भूलने वाली नहीं थी।

                                               


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