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ये वक्त की...

ये वक्त की नज़ाकत है साहब ना बराबर नाही आगे किसी को देखना चाहता। इंसा करता रहता है कोशिश पूरी पर मुट्ठी की रेत की नाईं वक्त फिसलते जाता। ।

By Dr. Madhukar Rao Larokar
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