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सोचता...

“ सोचता हूँ - एक बार मर जाऊँ। मरकर - मौत का अंज़ाम देख लूँ. ताकि, जीने का अंदाज, बदल सकूँ... सुना था - ज़िदंगी चार दिन की... पर कमबख्त, पाँचवा दिन भी आया। जब सोचा - ज़िदंगी बहुत लम्बी... हर जगह, लाशों का ढ़ेर पाया।। ”

By ANIL BAKSHI
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