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खत पढ़ते भी...

खत पढ़ते भी रहे और डरते भी रहे ताउम्र यूँ ही मोहब्बत करते भी रहे एक आरज़ू थी साथ-साथ जीने की इसी आरज़ू पर रोज़ मरते भी रहे खता क्या थी हम गैर- मजहबी थे बिना गलती जुर्मान भरते भी रहे salil saroj

By Salil Saroj
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