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दर्द को...

दर्द को ढालते हैं नग़मों में और सोज़ को साज़ में बदलते हैं। दाद दे हमको ए ग़मे-दूनियाँ, ज़ख्म खा कर भी फूल उगलते हैं ।

By Prem Bajaj
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