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दिन भर का...

दिन भर का थका सूरज साँझ की चादर ओढ़े धीमे धीमे रात के अंधेरे में गुम ज़रूर हो जाता है मगर सुबह फिर एक नए जोश एक नयी उमंग के साथ जाग जाता है अपनी अंगिनित किरणें फिर उसी जोश से बिखेर देता है एक नया उजाला देने कोयही उसका किरदार है उसे रोशनी अंधेरों को पार कर के ही मिलती है ! ...सोनल

By Sonal Bhatia Randhawa
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