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बदगुमानी थी...

बदगुमानी थी ग़ैरों से पता नहीं क्यों ज़हन में बदगुमानी थी ग़ैरों से उनकी अपनाइयत पर अफ़सोस हुआ अपनी तंग सोच पर जब देखा, रुख़सती पर कंधे तो ग़ैरों के भी थे

By YOGESHWAR DAYAL Mathur
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