सर्द की ये तन्हा रात
सर्द की ये तन्हा रात
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सर्द की ये तन्हा रात है।
दिल में एक जज्बात है।
तेरी कमी खल रही मुझे,
बस अश्कों की बरसात है।
गमों का घना सा कोहरा है।
तेरी यादों का बस पहरा है।
चाहे जिधर भी देखता हूं मैं,
बस दिखता तेरा चेहरा है।
तुझे अब तक भुला न पाए।
रोज रात खुद को तड़पाए।
इसी आस में अब जिंदा हूं,
शायद तू लौटकर आ जाए।
पर अब मैं अंदर से टूट रहा।
आस का दामन भी छूट रहा।
शायद अब तू लौटकर न आए,
यही ख्याल मेरा नींद लूट रहा।
तेरे बिन मैं कैसे रह पाऊंगा?
इस हाल में कैसे जी पाऊंगा?
