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सोशल साईट्

सोशल साईट्

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सोशल साईट्
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इस सोशल साईट्स की दुनिया ने
न जाने क्या कर दिया
अन्जानो से दोस्ती तो करवाई
पर अपनो से दूर कर दिया
आज इनके बिना जीवन जैसे
व्यर्थ लगता है कहे अब इसमे ही 
अर्थ  लगता है
वक्त के साथ 
रिश्ते खो रहे है
अपने बेगाने और..
बेगाने अपने हो रहे है
बच्चों पर ध्यान नही
घर भी बेहाल रहता है
ना अब सामाजिक रुचियों का
ना ही खाने का ख्याल रहता है
बच्चे हो या बड़े 
सभी की नब्ज ये पकङे है
लगभग समाज के हर दायरे
को ये बिमारी जकड़े है
मै भी अछूती नही हू
अब इस रोग से
लगता है शनि जुड़ा है
मेरे भी किसी योग से
पर क्या ये दायरा
यही सिमट रह जायेगा
हर रिश्ते की महत्ता 
फिर इंसान कैसे समझ पायेगा
पापा का फोन
मम्मी की चेटिंग
बच्चों की बढ रही है
इससे जो डेटिंग
कही न कही उस पर रोक लगानी होगी
सामाजिक महत्ताऐं
अब वापस पढानी होगी
वर्ना ये ज्ञान न जाने 
किस और ले जायेगा
समय की रफ्तार के साथ
दूरी अपनो से तय करायेगा


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