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साथी

साथी

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ढलता सूरज है हर शाम,

करके हवाले चाँद को उसके काम l


बिखरी चांदनी में शम्मे-मोहब्बत जलती हैं,

और धुआं जज़्बा-ए-इश्क़ की उठती है l


लाता सूरज नयी सुबह है हर रोज,

हर रात बना के चाँद को फ़िरोज़ l



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